श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 11
अध्याय 3 – कर्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ .
parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ॥
अर्थ
इस यज्ञ से तुम देवताओं को सन्तुष्ट करो, और वे देवता तुम्हें पुष्ट करें। इस प्रकार एक-दूसरे का उन्नयन करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे
शब्दार्थ
- देवान् – देवताओं को
- भावयत – प्रसन्न करो, पोषित करो
- अनेन – इस (यज्ञ) से
- ते – वे
- देवाः – देवता
- भावयन्तु – पोषित करें
- वः – तुम्हें
- परस्परम् – एक-दूसरे को
- भावयन्तः – उन्नत करते हुए
- श्रेयः – कल्याण
- परम् – परम
- अवाप्स्यथ – प्राप्त करोगे
अन्वय
अनेन देवान् भावयत; ते देवाः वः भावयन्तु; परस्परं भावयन्तः परं श्रेयः अवाप्स्यथ ।
व्याख्या
यहाँ परस्पर भावना का सुन्दर सिद्धान्त है। मनुष्य देवताओं को — अर्थात् जल, वायु, अग्नि, सूर्य जैसी प्राकृतिक और दिव्य शक्तियों को — यज्ञ द्वारा सन्तुष्ट करता है, और वे शक्तियाँ बदले में मनुष्य को अन्न, वर्षा और जीवन-रस से पोषित करती हैं। यह एकतरफा लेन-देन नहीं, बल्कि दो ओर बहती धारा है।
‘परस्परं भावयन्तः’ इस श्लोक की कुंजी है। अर्थात् न कोई केवल देता है और न केवल लेता है। प्रकृति और मनुष्य एक-दूसरे को पुष्ट करें तो जगत में सन्तुलन बना रहता है, और उसी से ‘परं श्रेयः’ — परम कल्याण — सम्भव है। शंकराचार्य के अनुसार यह श्रेय अन्ततः ज्ञान-प्राप्ति के द्वार तक ले जाता है।
रामानुज के अनुसार देवता परमात्मा के ही शरीर या अंग हैं, इसलिए उनकी उपासना वस्तुतः परमेश्वर की ही आराधना है। आधुनिक दृष्टि से इसे पर्यावरण और सामाजिक सहयोग की चेतना के रूप में भी समझा जा सकता है: जो हम धरती से लेते हैं, उसका सम्मान और पुनर्भरण भी हमारा कर्तव्य है।
यह श्लोक अहंकार का इलाज है — कोई भी अपने बल पर पूर्ण नहीं है, हम सब एक विशाल परस्परता के अंग हैं।
प्रसंग
3.10 में प्रजापति ने यज्ञ को कामधेनु बताया था। अब 3.11 उस यज्ञ-व्यवस्था का मूल सिद्धान्त बताता है — देवताओं और मनुष्यों का पारस्परिक पोषण। इसके बाद 3.12 में बताया जाएगा कि जो बिना लौटाए भोगता है, वह चोर है।
जीवन-शिक्षा
जीवन आदान-प्रदान से फलता-फूलता है। प्रकृति, समाज और परिवार से जो पाते हैं, उसके प्रति कृतज्ञ होकर लौटाइए; सच्ची समृद्धि पारस्परिक पोषण में है।
मुख्य शब्द
- देव
- प्राकृतिक और दिव्य शक्तियाँ — अग्नि, वायु, इन्द्र आदि
- भावना
- पोषण, सन्तुष्ट करना, उन्नत करना
- श्रेयस्
- परम कल्याण
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 3.6 – कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य
- गीता 3.7 – यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन
- गीता 3.8 – नियतं कुरु कर्म
- गीता 3.9 – यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः
- गीता 3.10 – सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा
- गीता 3.12 – इष्टान्भोगान्हि वो देवा
- गीता 3.13 – यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते
- गीता 3.14 – अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः
- गीता 3.15 – कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि
- गीता 3.16 – एवं प्रवर्तितं चक्रं