श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 44
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam .
paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam ॥
अर्थ
खेती, गौ-पालन (पशुपालन) और व्यापार — ये वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं; और सेवा-रूप कर्म शूद्र का भी स्वभाव से उत्पन्न कर्म है
शब्दार्थ
- कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यम् – खेती, गौ-रक्षा (पशुपालन) और व्यापार
- वैश्यकर्म – वैश्य का कर्म
- स्वभावजम् – स्वभाव से उत्पन्न
- परिचर्यात्मकम् – सेवा-स्वरूप
- कर्म – कर्म
- शूद्रस्य – शूद्र का
- अपि – भी
- स्वभावजम् – स्वभाव से उत्पन्न
अन्वय
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं स्वभावजं वैश्यकर्म; परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्य अपि स्वभावजम् ।
व्याख्या
वैश्य के तीन स्वाभाविक कर्म बताए गए हैं — कृषि, गौरक्ष्य और वाणिज्य। ‘कृषि’ अर्थात् खेती, जिससे पूरे समाज का अन्न उत्पन्न होता है। ‘गौरक्ष्य’ अर्थात् गौ आदि पशुओं का पालन और रक्षा, जो प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था का आधार था। ‘वाणिज्य’ अर्थात् व्यापार, जिससे वस्तुएँ और सेवाएँ समाज में प्रवाहित होती हैं। ये तीनों मिलकर समाज की आर्थिक रीढ़ बनाते हैं। वैश्य समाज का पोषक है — वह धन और अन्न का सृजन और वितरण करता है।
शूद्र का स्वाभाविक कर्म ‘परिचर्यात्मक’ — सेवा-रूप — बताया गया है। सेवा का अर्थ यहाँ अन्य सभी वर्णों के कार्यों में सहयोग और श्रम है। कोई भी समाज, कोई भी संस्था, बिना श्रम और सेवा के नहीं चल सकती। जैसे शरीर में पैर पूरे शरीर का भार उठाते हैं, वैसे ही सेवा-कर्म समाज का आधार है।
यहाँ यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि गीता किसी कर्म को हीन नहीं मानती। अगले ही श्लोकों में (18.45–46) भगवान घोषणा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वाभाविक कर्म में लगा रहकर परम सिद्धि प्राप्त करता है, और अपने कर्म द्वारा भगवान की पूजा करके सिद्धि पाता है। अर्थात् ब्राह्मण का अध्ययन और शूद्र की सेवा — दोनों ही भगवान की आराधना के रूप में समान रूप से मोक्षदायक हैं। नौवें अध्याय (9.32) में भी भगवान ने स्पष्ट कहा था कि जो भी उनकी शरण लेता है, वह परम गति पाता है।
इतिहास में वर्ण-व्यवस्था के नाम पर जन्म-आधारित ऊँच-नीच और भेदभाव भी हुआ, जो गीता की भावना के विपरीत है, क्योंकि गीता सबमें एक ही आत्मा देखने को सात्त्विक ज्ञान कहती है (18.20) और पण्डित को समदर्शी कहती है (5.18)। इस श्लोक का सार्वकालिक सन्देश यह है कि कृषि, उद्योग, व्यापार और सेवा — ये सभी समाज के लिए उतने ही आवश्यक और पवित्र हैं जितना ज्ञान और शासन।
प्रसंग
पिछले दो श्लोकों में ब्राह्मण और क्षत्रिय के कर्म बताए गए। यह श्लोक वैश्य और शूद्र के कर्म बताता है। अगले श्लोक (18.45) में भगवान कहते हैं कि अपने-अपने कर्म में लगा मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है।
जीवन-शिक्षा
किसान, व्यापारी, कारीगर और सेवा करने वाले — ये सब समाज की नींव हैं; किसी भी श्रम को छोटा न समझें। हर कार्य, यदि ईमानदारी और समर्पण से किया जाए, तो पूजा बन जाता है। सबके प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव रखें।
मुख्य शब्द
- कृषि
- खेती
- गौरक्ष्य
- गौ आदि पशुओं का पालन और रक्षा
- वाणिज्य
- व्यापार
- परिचर्या
- सेवा, सहयोग और श्रम
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.39 – यदग्रे चानुबन्धे च
- गीता 18.40 – न तदस्ति पृथिव्यां
- गीता 18.41 – ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च
- गीता 18.42 – शमो दमस्तपः शौचं
- गीता 18.43 – शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं
- गीता 18.45 – स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः
- गीता 18.46 – यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन
- गीता 18.47 – श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
- गीता 18.48 – सहजं कर्म कौन्तेय
- गीता 18.49 – असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा