श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 12, श्लोक 11
अध्याय 12 – भक्तियोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
athaitadapyaśakto.asi kartuṃ madyogamāśritaḥ .
sarvakarmaphalatyāgaṃ tataḥ kuru yatātmavān ॥
अर्थ
और यदि तुम यह भी करने में असमर्थ हो, तो मेरे योग का आश्रय लेकर, संयतचित्त होकर सब कर्मों के फल का त्याग करो
शब्दार्थ
- अथ – यदि
- एतत् अपि – यह भी
- कर्तुम् – करने में
- अशक्तः असि – असमर्थ हो
- ततः – तो फिर
- मद्योगम् आश्रितः – मेरे योग का आश्रय लेकर
- यतात्मवान् – संयमित चित्त वाला होकर
- सर्वकर्मफलत्यागम् – सब कर्मों के फल का त्याग
- कुरु – करो
अन्वय
अथ एतत् अपि कर्तुम् अशक्तः असि, ततः मद्योगम् आश्रितः यतात्मवान् (सन्) सर्वकर्मफलत्यागं कुरु ।
व्याख्या
यह सीढ़ी का अन्तिम पायदान है। जो भगवान् के निमित्त कर्म भी न कर सके, उसके लिए भी भगवान् ने मार्ग छोड़ा है: ‘सर्वकर्मफलत्यागम्’ — सब कर्मों के फल का त्याग। यहाँ भगवान् ने कर्म करने से मना नहीं किया; कर्म तो करना है, पर परिणाम की चिन्ता, अधिकार और आसक्ति छोड़ देनी है। यह वही सूत्र है जो दूसरे अध्याय के 2.47 में आया था — कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं।
इस विकल्प के साथ दो शर्तें हैं: ‘मद्योगमाश्रितः’ और ‘यतात्मवान्’। पहली का अर्थ है कि यह त्याग भी भगवान् की शरण में रहकर हो, केवल अपने बल पर नहीं। दूसरी का अर्थ है कि चित्त संयमित हो, ताकि फलासक्ति पुनः न लौटे। फल की चाह मन में बैठी हो तो ऊपर से त्याग का नाम लेना व्यर्थ है; वास्तविक त्याग भीतर की आसक्ति छोड़ने में है।
शंकराचार्य यहाँ कहते हैं कि जो भगवान् के लिए कर्म करने में भी असमर्थ है, वह कम से कम अपने सामान्य कर्मों के फल की इच्छा छोड़ दे; यह चित्त-शुद्धि का साधन बनेगा और उसे आगे ले जाएगा। रामानुज के अनुसार जो भक्ति के साधन नहीं कर पाता, उसे भी निष्काम कर्म से धीरे-धीरे ऊपर उठना है।
इस प्रकार साधना की सारी सीढ़ी पूरी होती है, और भगवान् ने स्पष्ट कर दिया कि कोई भी मनुष्य यहाँ निराश नहीं है: जो जहाँ खड़ा है, वहीं से आगे बढ़ सकता है।
प्रसंग
12.8 से 12.10 में तीन उपाय बताए गए। यहाँ चौथा और अन्तिम उपाय — कर्मफल-त्याग — आता है। अगला श्लोक (12.12) इन सभी साधनों का क्रम और उनकी तुलना बताता है।
जीवन-शिक्षा
परिणाम की चिन्ता छोड़कर पूरे मन से कर्म करने का अभ्यास तनाव और चिन्ता को कम करता है। यह सबसे व्यावहारिक साधना है, जो हर व्यक्ति अपनी वर्तमान परिस्थिति में कर सकता है।
मुख्य शब्द
- कर्मफलत्याग
- कर्म करना पर उसके फल की आसक्ति छोड़ देना
- मद्योगाश्रय
- भगवान् की शरण में रहकर साधना करना
- यतात्मवान्
- जिसने मन-इन्द्रियों को वश में किया है
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 12.6 – ये तु सर्वाणि
- गीता 12.7 – तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्
- गीता 12.8 – मय्येव मन आधत्स्व
- गीता 12.9 – अथ चित्तं समाधातुं
- गीता 12.10 – अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव
- गीता 12.12 – श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं
- गीता 12.13 – अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः
- गीता 12.14 – सन्तुष्टः सततं योगी
- गीता 12.15 – यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते
- गीता 12.16 – अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो