भगवद् गीता वर्ल्ड

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

द्वादशाक्षर मंत्र — भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को नमस्कार। श्रीमद्भागवत का मूल मंत्र, जो नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

oṃ namo bhagavate vāsudevāya

अर्थ: "ॐ, मैं उन भगवान वासुदेव को नमस्कार करता हूँ" — जो सबमें वास करते हैं और जिनमें सब वास करता है। "भगवान" शब्द में ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य — ये छह गुण पूर्ण रूप से समाए हैं।

इसे द्वादशाक्षर (बारह अक्षरों वाला) मंत्र कहते हैं। श्रीमद्भागवत में नारद जी ने यही मंत्र ध्रुव को दिया था, और भागवत का आरंभ भी इसी मंत्र से होता है। यह मंत्र सबके लिए खुला माना जाता है।

जप की सरल विधि: प्रातः स्नान के बाद शांत स्थान पर बैठें, भगवान का ध्यान करें और तुलसी या चंदन की माला पर 108 बार (एक माला) जप करें। मन भटके तो उसे धीरे से फिर नाम पर लाएँ। संख्या से अधिक महत्व भाव और नियमितता का है।

Syllables
12
Source
Shrimad Bhagavatam 4.8.54 (instruction of Narada to Dhruva); also the opening invocation of the Bhagavatam
Japa Count
108

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