भगवद्गीता का उपदेश क्यों दिया गया?
युद्धभूमि में मोह और शोक से घिरे अर्जुन को उनके कर्तव्य का बोध कराने और उनके संशय दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया।
उत्तर
कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा होने पर अर्जुन ने सामने अपने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, भाइयों और संबंधियों को देखा। उनका मन करुणा और मोह से भर गया, उनके हाथ से गांडीव धनुष छूटने लगा और उन्होंने युद्ध न करने का निर्णय कर लिया। यह केवल एक योद्धा की दुविधा नहीं थी, बल्कि उस हर मनुष्य की दुविधा थी जो कर्तव्य और भावना के बीच फँस जाता है।
अर्जुन ने स्वयं को श्रीकृष्ण का शिष्य मानकर शरण ली और मार्गदर्शन माँगा। तब भगवान ने उन्हें आत्मा की अमरता, निष्काम कर्म, ज्ञान, ध्यान और भक्ति का उपदेश दिया। अंत में अर्जुन ने कहा कि उनका मोह नष्ट हो गया है और वे भगवान की आज्ञा का पालन करेंगे।
भक्तों का विश्वास है कि अर्जुन को निमित्त बनाकर भगवान ने यह ज्ञान समस्त मानवता के लिए दिया, ताकि हर युग में लोग जीवन के संघर्षों में धर्म का मार्ग पहचान सकें।
- Source
- Bhagavad Gita, chapters 1, 2 and 18