गीता के चार योग कौन-से हैं?
कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग, ये चार मार्ग गीता में प्रमुख रूप से बताए गए हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं।
उत्तर
कर्मयोग का अर्थ है फल की आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करना और कर्म को भगवान को अर्पित करना। तीसरा अध्याय इसका विशेष रूप से वर्णन करता है।
ज्ञानयोग विवेक का मार्ग है, जिसमें साधक समझता है कि वह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अविनाशी आत्मा है। दूसरे, चौथे और तेरहवें अध्याय में इसका सुंदर विवेचन है।
ध्यानयोग मन और इंद्रियों को संयमित करके भीतर स्थिर होने का अभ्यास है। छठे अध्याय में बैठने की विधि, संतुलित आहार-विहार और अभ्यास तथा वैराग्य से मन को वश में करने की बात कही गई है।
भक्तियोग भगवान के प्रति प्रेमपूर्ण समर्पण का मार्ग है। बारहवें अध्याय में भक्त के गुण बताए गए हैं, और अंत में भगवान सब धर्मों को छोड़कर अपनी शरण में आने का आह्वान करते हैं।
अलग-अलग आचार्य इन मार्गों पर अलग-अलग बल देते हैं, पर गीता का भाव यह है कि ये चारों मिलकर एक संतुलित आध्यात्मिक जीवन बनाते हैं।
- Yogas
- Karma Yoga, Jnana Yoga, Dhyana Yoga, Bhakti Yoga