भक्ति क्या है?
भक्ति का अर्थ है भगवान के प्रति निःस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण, जिसे गीता और भागवत में सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग कहा गया है।
उत्तर
"भक्ति" शब्द संस्कृत की "भज्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है सेवा करना, प्रेम करना और भाग लेना। भक्ति का अर्थ है भगवान से बिना किसी स्वार्थ के प्रेम करना और अपना जीवन उन्हें समर्पित कर देना।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रेम से अर्पित एक पत्ता, फूल, फल या जल भी वे स्वीकार करते हैं, और बारहवें अध्याय में वे अपने प्रिय भक्त के गुण बताते हैं: द्वेष रहित, सबका मित्र, करुणामय, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील।
श्रीमद्भागवत में भक्त प्रह्लाद नवधा भक्ति, अर्थात भक्ति के नौ रूप बताते हैं: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। इनमें से कोई भी एक मार्ग सच्चे मन से अपनाने पर भगवान तक पहुँचाता है।
भक्ति के लिए जाति, धन, विद्या या आयु की कोई शर्त नहीं है। मीरा, सूरदास, नरसिंह मेहता और अनेक संतों का जीवन दिखाता है कि सच्चा प्रेम ही भगवान को सबसे प्रिय है।
- Source
- Bhagavad Gita 9.26 and ch. 12; Shrimad Bhagavatam, Canto 7