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श्रीकृष्ण मोरपंख और बाँसुरी क्यों धारण करते हैं?

मोरपंख और बाँसुरी व्रज के ग्वाले के रूप में श्रीकृष्ण की पहचान हैं; परंपरा में इनके कई सुंदर प्रतीकात्मक अर्थ बताए जाते हैं।

उत्तर

श्रीमद्भागवत में वृंदावन के ग्वाले के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन मोरपंख के मुकुट, वनमाला और बाँसुरी के साथ किया गया है। ये उनके सरल, प्रकृति-प्रेमी व्रज जीवन की पहचान हैं।

मोरपंख के बारे में परंपरा में कई लोकप्रिय व्याख्याएँ हैं। एक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण की बाँसुरी पर नाचते मोरों ने प्रेम से अपना पंख उन्हें भेंट किया। मोरपंख में सभी रंग होते हैं, जो दर्शाते हैं कि भगवान में संपूर्ण सृष्टि के रंग समाए हैं। कुछ लोग इसे पवित्रता और सौंदर्य का प्रतीक भी मानते हैं।

बाँसुरी के बारे में एक प्रचलित भाव यह है कि वह भीतर से खाली है, इसलिए भगवान उसमें अपना स्वर भरते हैं। भक्त का हृदय भी जब अहंकार से खाली होता है, तभी भगवान उसमें अपना संगीत भरते हैं। भागवत में वर्णन है कि उनकी बाँसुरी की धुन सुनकर गोपियाँ, गायें, पक्षी और नदियाँ तक मुग्ध हो जाती थीं।

ये व्याख्याएँ भक्ति-परंपरा और लोककथाओं से आई हैं, और भक्तों को भगवान के माधुर्य का स्मरण कराती हैं।

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