श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 25
अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
dhūmo rātristathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam .
tatra cāndramasaṃ jyotiryogī prāpya nivartate ॥
अर्थ
धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः मास — इस मार्ग में जाकर योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर फिर लौट आता है
शब्दार्थ
- धूमः – धूम (धुआँ)
- रात्रिः – रात्रि
- तथा – तथा
- कृष्णः – कृष्ण पक्ष
- षण्मासाः दक्षिणायनम् – दक्षिणायन के छः मास
- तत्र – उस मार्ग में
- चान्द्रमसम् ज्योतिः – चन्द्रमा की ज्योति को
- योगी – योगी (कर्मयोगी)
- प्राप्य – प्राप्त होकर
- निवर्तते – लौट आता है
अन्वय
धूमः रात्रिः तथा कृष्णः षण्मासाः दक्षिणायनम् — तत्र योगी चान्द्रमसं ज्योतिः प्राप्य निवर्तते ।
व्याख्या
पिछले श्लोक का प्रकाश-मार्ग यहाँ अपने विपरीत धूम-मार्ग के साथ रखा गया है। इसमें धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः मास हैं — सभी अन्धकार या मद्धिम प्रकाश के सूचक। उपनिषदों में यह ‘पितृयान’ है (छान्दोग्य 5.10), जिसमें जीव धूम आदि देवताओं से होकर चन्द्रलोक तक जाता है।
इस मार्ग के पथिक के लिए ‘योगी’ शब्द आया है। शंकराचार्य के अनुसार यहाँ योगी का अर्थ कर्मयोगी है, यानी वह जो वैदिक यज्ञ, दान और पुण्य कर्म फल की इच्छा से करता है, पर ब्रह्मज्ञान तक नहीं पहुँचा है। ऐसे कर्मों से वह चन्द्रलोक में पुण्य का सुख भोगता है, और पुण्य क्षीण होने पर फिर इस लोक में लौटता है (तुलना कीजिए 9.20–21)। इसीलिए यहाँ ‘प्राप्य निवर्तते’ कहा गया — चन्द्र-ज्योति को पाकर वह लौटता है।
इस श्लोक का कथन निंदा नहीं, यथार्थ का वर्णन है। पुण्य कर्म भी अच्छे हैं और उनका फल भी मिलता है, पर वह फल सीमित है। जो साधक फल की कामना में बँधा रहता है, उसकी यात्रा चक्र में लौटती रहती है; जो ज्ञान और भक्ति से मुक्त होना चाहता है, वह अपुनरावृत्ति पाता है।
इसलिए दोनों मार्गों का अन्तर सतही ‘समय’ में नहीं, भीतर के भाव में है: एक ओर ज्ञान और निष्कामता का प्रकाश, दूसरी ओर कामना-जनित कर्म का धुँधलापन।
प्रसंग
8.24 में प्रकाश-मार्ग का वर्णन हुआ। यहाँ उसके विपरीत कृष्ण (धूम) मार्ग का वर्णन है जिसमें लौटना पड़ता है। अगले श्लोक (8.26) में दोनों मार्गों का सार दिया जाएगा।
जीवन-शिक्षा
फल की कामना से किए गए अच्छे कर्म भी सीमित फल देते हैं। निष्काम भाव और ज्ञान से किया कर्म बन्धन से मुक्ति की ओर ले जाता है; इसलिए कर्म करते समय अपनी कामना को परखते रहें।
मुख्य शब्द
- दक्षिणायन
- सूर्य का दक्षिण की ओर गमन; कृष्ण मार्ग का सूचक
- कृष्ण मार्ग (पितृयान)
- धूम-रात्रि-कृष्णपक्ष वाला मार्ग; पुनर्जन्म की ओर
- चान्द्रमस ज्योति
- चन्द्रलोक का सुख, पुण्य-फल का भोग
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 8.20 – परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः
- गीता 8.21 – अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां
- गीता 8.22 – पुरुषः स परः
- गीता 8.23 – यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं
- गीता 8.24 – अग्निर्जोतिरहः शुक्लः षण्मासा
- गीता 8.26 – शुक्लकृष्णे गती ह्येते
- गीता 8.27 – नैते सृती पार्थ
- गीता 8.28 – वेदेषु यज्ञेषु तपःसु