श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 26
अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
śuklakṛṣṇe gatī hyete jagataḥ śāśvate mate .
ekayā yātyanāvṛttimanyayāvartate punaḥ ॥
अर्थ
जगत् के ये शुक्ल और कृष्ण दोनों मार्ग सनातन माने गए हैं। एक के द्वारा जीव अपुनरावृत्ति (मोक्ष) को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा फिर लौट आता है
शब्दार्थ
- जगतः – जगत् की
- एते – ये दोनों
- शुक्लकृष्णे – शुक्ल और कृष्ण
- गती – गतियाँ, मार्ग
- हि – निश्चय ही
- शाश्वते – सनातन, अनादि
- मते – माने गए हैं
- एकया – एक के द्वारा
- याति – जाता है
- अनावृत्तिम् – न लौटने को
- अन्यया – दूसरे के द्वारा
- आवर्तते पुनः – फिर लौट आता है
अन्वय
जगतः एते शुक्लकृष्णे गती हि शाश्वते मते; एकया अनावृत्तिं याति, अन्यया पुनः आवर्तते ।
व्याख्या
इस श्लोक में पिछले दो श्लोकों (8.24–25) का सार दिया गया है। संसार में दो ही मूल मार्ग चलते आए हैं — शुक्ल और कृष्ण। ‘शाश्वते’ शब्द बताता है कि ये दोनों अनादि प्रवाह हैं; जब से जगत् है, जीव इन्हीं दो रास्तों से गुजरता रहा है।
फल दो हैं: एक मार्ग ‘अनावृत्ति’ की ओर ले जाता है और दूसरा ‘पुनः आवर्तन’ की ओर। पहला ज्ञान और उपासना का मार्ग है, दूसरा कामना-सहित कर्म का मार्ग। शंकराचार्य इस श्लोक को पूरे विषय का निष्कर्ष मानते हैं: जो ज्ञान से प्रकाश-मार्ग पर जाता है वह मुक्ति पाता है, और जो केवल कर्म-फल की कामना करता है वह लौटता है। रामानुज के लिए पहला मार्ग भक्त का है जो परमपद में स्थिर हो जाता है।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि भगवान् ने जीवों के लिए केवल निराशाजनक चित्र नहीं रखा। कृष्ण मार्ग का वर्णन भी इसलिए है कि साधक देखे कि कर्म का फल सीमित है और शुक्ल मार्ग की ओर आकर्षित हो। यह उपदेश भय के लिए नहीं, विवेक के लिए है।
एक दृष्टि से यह भी कहा जा सकता है कि हर क्षण हमारे सामने प्रकाश और अन्धकार का चुनाव है: ज्ञान या अज्ञान, निष्कामता या कामना। उसी चुनाव का विस्तार अन्त में इन दो मार्गों के रूप में दिखता है।
प्रसंग
8.24 और 8.25 में दो मार्ग अलग-अलग बताए गए। यहाँ उनका सार है, और अगले श्लोक (8.27) में उन्हें जानने का फल — योगी का मोहित न होना — कहा जाता है।
जीवन-शिक्षा
हर दिन के छोटे चुनाव हमारी बड़ी दिशा बनाते हैं। प्रकाश-मार्ग यानी ज्ञान, सेवा और भक्ति का चुनाव बार-बार करने से जीवन की दिशा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर होती है।
मुख्य शब्द
- शुक्ल-कृष्ण गति
- प्रकाश और अन्धकार नामक दो मार्ग
- शाश्वत
- अनादि-प्रवाह; सदा से चले आ रहे
- अनावृत्ति / आवृत्ति
- न लौटना / लौटना