श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 7
अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ .
sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyate ॥
अर्थ
जो योग से युक्त, शुद्ध अन्तःकरण वाला, मन-देह को जीता हुआ, इन्द्रियों को जीतने वाला और सब प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा जानने वाला है, वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता
शब्दार्थ
- योगयुक्तः – योग (कर्मयोग) से युक्त
- विशुद्धात्मा – शुद्ध अन्तःकरण वाला
- विजितात्मा – जीते हुए मन/देह वाला
- जितेन्द्रियः – इन्द्रियों को जीतने वाला
- सर्वभूतात्मभूतात्मा – जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा हो गई है
- कुर्वन् – करता हुआ
- अपि – भी
- न लिप्यते – लिप्त नहीं होता
अन्वय
योगयुक्तः विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः सर्वभूतात्मभूतात्मा (सन्) कुर्वन् अपि न लिप्यते ।
व्याख्या
यह श्लोक कर्मयोगी की पूर्ण परिभाषा देता है, और इसमें पाँच विशेषण हैं। वह ‘योगयुक्त’ है — कर्मयोग में स्थित। वह ‘विशुद्धात्मा’ है — जिसका अन्तःकरण पवित्र है। वह ‘विजितात्मा’ है — जिसने अपने मन और शरीर को वश में कर लिया है। वह ‘जितेन्द्रिय’ है। और सबसे ऊँची बात यह कि वह ‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’ है — जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा के साथ एक हो गई है।
अन्तिम विशेषण अत्यन्त गहरा है। शंकराचार्य के अनुसार इसका अर्थ यह है कि उसे सब प्राणियों में अपना ही आत्मा दिखाई देता है, इसलिए किसी से द्वेष या भेदभाव सम्भव नहीं। रामानुज के अनुसार उसकी दृष्टि में सब प्राणी उसी परमात्मा का शरीर हैं। जब कर्ता की दृष्टि इतनी व्यापक होती है, तब कर्म उसे बाँध नहीं पाता।
‘कुर्वन्नपि न लिप्यते’ — करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। कमल का पत्ता पानी में रहकर भी भीगता नहीं। उसके कर्मों में स्वार्थ, कर्तृत्व का अभिमान और फल की चाह नहीं रहती, इसलिए पाप-पुण्य की छाप नहीं पड़ती।
यह एक ऐसा आदर्श है जिसमें व्यक्ति पूर्ण सक्रिय भी है और पूर्ण स्वतंत्र भी। संसार में रहकर संसार से अछूता रहना ही कर्मयोग का फल है।
प्रसंग
5.6 में कर्मयोग के शीघ्र फल की बात कही गई। 5.7 उस योगी की स्थिति बताता है। इसके बाद 5.8–5.9 में बताया जाएगा कि वह अपने कर्मों को किस दृष्टि से देखता है।
जीवन-शिक्षा
जब हमारे कर्म सबके कल्याण की भावना से होते हैं और मन शुद्ध व संयमित रहता है, तब कर्म हमें थकाते या बाँधते नहीं। व्यापक दृष्टि ही अनासक्ति का आधार है।
मुख्य शब्द
- विशुद्धात्मा
- पवित्र अन्तःकरण वाला
- जितेन्द्रिय
- जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया हो
- सर्वभूतात्मभूतात्मा
- सब प्राणियों में अपने ही आत्मा को देखने वाला
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 5.2 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 5.3 – ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी
- गीता 5.4 – साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति
- गीता 5.5 – यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं
- गीता 5.6 – संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः
- गीता 5.8 – नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो
- गीता 5.9 – प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि
- गीता 5.10 – ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं
- गीता 5.11 – कायेन मनसा बुद्ध्या
- गीता 5.12 – युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा