श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 12
अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
adhyātmajñānanityatvaṃ tattvajñānārthadarśanam .
etajjñānamiti proktamajñānaṃ yadato.anyathā ॥
अर्थ
अध्यात्मज्ञान में निरंतर स्थित रहना और तत्त्वज्ञान के लक्ष्य — परमात्मा — का दर्शन करना; यह सब ज्ञान कहा गया है, और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है
शब्दार्थ
- अध्यात्मज्ञान – आत्मा-संबंधी ज्ञान
- नित्यत्वम् – निरंतरता, सदा उसमें स्थित रहना
- तत्त्वज्ञान – परम सत्य का ज्ञान
- अर्थ – प्रयोजन, लक्ष्य
- दर्शनम् – देखना, साक्षात् अनुभव करना
- एतत् – यह (सब)
- ज्ञानम् – ज्ञान
- इति – इस प्रकार
- प्रोक्तम् – कहा गया है
- अज्ञानम् – अज्ञान
- यत् – जो
- अतः – इससे
- अन्यथा – विपरीत, भिन्न
अन्वय
अध्यात्म-ज्ञान-नित्यत्वम्, तत्त्व-ज्ञान-अर्थ-दर्शनम् — एतत् ज्ञानम् इति प्रोक्तम्; यत् अतः अन्यथा, (तत्) अज्ञानम् ।
व्याख्या
इस श्लोक के साथ 13.8 से आरंभ हुई ज्ञान के बीस लक्षणों की सूची पूर्ण होती है। अंतिम दो लक्षण सबसे ऊँचे हैं। पहला है ‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्व’ — आत्मा और अनात्मा के विवेक में निरंतर लगे रहना। यह एक बार पढ़ लेने या सुन लेने की बात नहीं; यह जीवन भर का सतत चिंतन और स्मरण है, जिसमें साधक बार-बार स्वयं को देह, मन और बुद्धि से अलग साक्षी के रूप में पहचानता है।
दूसरा है ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शन’ — तत्त्वज्ञान का जो अर्थ अर्थात् प्रयोजन है, उसे देखना। आचार्य शंकर कहते हैं कि तत्त्वज्ञान का फल मोक्ष है; उस फल पर दृष्टि बनाए रखने से साधक में साधना के प्रति उत्साह बना रहता है। रामानुजाचार्य इसे आत्मा के यथार्थ स्वरूप और परमात्मा की प्राप्ति रूपी लक्ष्य के निरंतर ध्यान के रूप में समझाते हैं।
फिर भगवान एक गहरी बात कहते हैं: ‘एतत् ज्ञानम्’ — यह सब ज्ञान है। अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, सरलता से लेकर अनन्य भक्ति और तत्त्वदर्शन तक — ये गुण ही ज्ञान कहलाते हैं। इसका अर्थ है कि गीता की दृष्टि में ज्ञान केवल बौद्धिक सूचना नहीं, बल्कि रूपांतरित चरित्र है। जो इनसे विपरीत है — मान, दंभ, हिंसा, क्रोध, आसक्ति — वह अज्ञान है, चाहे व्यक्ति कितने ही शास्त्र जानता हो।
यह कसौटी आत्म-परीक्षण के लिए अत्यंत उपयोगी है। हम अपने ज्ञान को अपने आचरण से ही माप सकते हैं। यही भाव 16वें अध्याय की दैवी संपत्ति में भी दिखता है।
प्रसंग
यह श्लोक 13.8 से चल रही ज्ञान-लक्षणों की सूची का समापन है। पिछले श्लोक (13.11) में अनन्य भक्ति और एकांत-प्रियता बताई गई। अगले श्लोक (13.13) से भगवान ‘ज्ञेय’ — जानने योग्य परब्रह्म — का वर्णन आरंभ करते हैं।
जीवन-शिक्षा
सच्चा ज्ञान वह है जो जीवन में उतरकर चरित्र बन जाए। अपने ज्ञान को इस बात से परखें कि आपके भीतर नम्रता, क्षमा, अनासक्ति और भक्ति कितनी बढ़ी है।
मुख्य शब्द
- अध्यात्मज्ञाननित्यत्व
- आत्मज्ञान में निरंतर स्थिति और चिंतन
- तत्त्वज्ञानार्थदर्शन
- तत्त्वज्ञान के लक्ष्य — मोक्ष या परमात्मा — पर निरंतर दृष्टि
- अज्ञान
- ज्ञान के लक्षणों के विपरीत भाव और आचरण
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 13.7 – इच्छा द्वेषः सुखं
- गीता 13.8 – अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्
- गीता 13.9 – इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव
- गीता 13.10 – असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु
- गीता 13.11 – मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी
- गीता 13.13 – ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते
- गीता 13.14 – सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्
- गीता 13.15 – सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्
- गीता 13.16 – बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव
- गीता 13.17 – अविभक्तं च भूतेषु