श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 10
अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu .
nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu ॥
अर्थ
आसक्ति का अभाव, पुत्र, पत्नी, घर आदि में तादात्म्य या अत्यधिक लिपटाव का न होना, और प्रिय तथा अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त का सम बने रहना — ये भी ज्ञान के लक्षण हैं
शब्दार्थ
- असक्तिः – आसक्ति का अभाव, किसी वस्तु में प्रीति-बंधन न होना
- अनभिष्वङ्गः – गहरे तादात्म्य या चिपकाव का अभाव
- पुत्र – संतान
- दार – पत्नी
- गृह – घर
- आदिषु – आदि में (धन, संपत्ति, संबंधी आदि)
- नित्यम् – सदा, निरंतर
- च – और
- समचित्तत्वम् – चित्त की समता, मन का संतुलन
- इष्ट – प्रिय, मनचाहा
- अनिष्ट – अप्रिय, अनचाहा
- उपपत्तिषु – प्राप्ति होने पर, घटित होने में
अन्वय
असक्तिः, पुत्र-दार-गृह-आदिषु अनभिष्वङ्गः, च इष्ट-अनिष्ट-उपपत्तिषु नित्यम् समचित्तत्वम् ।
व्याख्या
भगवान ज्ञान के बीस लक्षणों की सूची को आगे बढ़ाते हुए यहाँ तीन गुण बताते हैं — असक्ति, अनभिष्वङ्ग और समचित्तत्व। ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं और क्रमशः सूक्ष्म होते जाते हैं। असक्ति का अर्थ है किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति ऐसा राग न होना जो मन को बाँध ले। अनभिष्वङ्ग उससे भी गहरी बात है: पुत्र, पत्नी, घर आदि के साथ ऐसा तादात्म्य न हो कि उनके सुख-दुःख को मनुष्य अपना ही सुख-दुःख मानकर विवेक खो दे।
आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि असक्ति सामान्य प्रीति का अभाव है, जबकि अभिष्वङ्ग वह विशेष आसक्ति है जिसमें व्यक्ति दूसरे के सुखी या दुःखी होने पर स्वयं को ही सुखी या दुःखी मान लेता है — मानो ‘वह मैं ही हूँ’। यह तादात्म्य ही बंधन का सूक्ष्म रूप है। यहाँ परिवार को छोड़ने का उपदेश नहीं है; अर्जुन गृहस्थ योद्धा हैं। उपदेश यह है कि कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाया जाए, प्रेम भी हो, परंतु मोह का वह जाल न हो जो आत्मज्ञान को ढक दे। रामानुजाचार्य इसे आत्मा के स्वरूप-ज्ञान से जोड़ते हैं: जो जानता है कि आत्मा देह और देह-संबंधों से भिन्न है, उसका संबंधों में स्वाभाविक रूप से अनासक्त भाव रहता है।
तीसरा लक्षण है इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में नित्य समचित्तता। ‘नित्यम्’ शब्द महत्त्वपूर्ण है — कभी-कभार का संतुलन नहीं, बल्कि स्थायी भाव। यही बात गीता 2.38 में ‘सुखदुःखे समे कृत्वा’ और 2.48 में ‘समत्वं योग उच्यते’ के रूप में कही गई है। प्रिय मिलने पर उछलना और अप्रिय आने पर टूट जाना — यह अज्ञान का लक्षण है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति स्वयं को परिस्थितियों से बँधा हुआ मानता है।
मध्वाचार्य के अनुसार यह समता भगवान की इच्छा पर भरोसे से आती है: जो कुछ प्राप्त होता है, वह प्रभु के विधान से है, इसलिए भक्त उसे शांति से स्वीकार करता है। इस प्रकार अद्वैत में यह समता आत्मा की असंगता के बोध से, और भक्ति-परंपराओं में ईश्वर-शरणागति से उत्पन्न होती है; दोनों का फल एक ही है — शांत और स्थिर चित्त।
ध्यान रहे कि भगवान इन्हें ‘ज्ञान’ कहते हैं, यद्यपि ये आचरण के गुण हैं। कारण यह है कि ये गुण ज्ञान के साधन भी हैं और ज्ञान के प्रकट चिह्न भी। जिसके जीवन में ये नहीं उतरे, उसका ज्ञान केवल शब्दों तक है।
प्रसंग
श्रीकृष्ण 13.8 से 13.12 तक ‘ज्ञान’ के लक्षण गिना रहे हैं, जिन्हें क्षेत्रज्ञ को जानने की योग्यता कहा गया है। पिछले श्लोक (13.9) में विषयों से वैराग्य, अहंकार-शून्यता और जन्म-मृत्यु आदि में दोष-दर्शन बताए गए; यहाँ उसी क्रम में संबंधों और परिस्थितियों के प्रति अनासक्ति कही गई। अगले श्लोक (13.11) में अनन्य भक्ति और एकांत-सेवन का वर्णन है।
जीवन-शिक्षा
परिवार और घर से प्रेम करें, उनकी पूरी सेवा करें, पर अपनी आंतरिक शांति को उनके हर उतार-चढ़ाव पर निर्भर न करें। जो कुछ भी जीवन में आए — अनुकूल या प्रतिकूल — उसे संतुलित मन से स्वीकार करने का अभ्यास ही सच्चा ज्ञान है।
मुख्य शब्द
- असक्ति
- वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति बाँधने वाले राग का अभाव
- अनभिष्वङ्ग
- दूसरों के साथ ऐसे तादात्म्य का अभाव जिसमें उनका सुख-दुःख अपना मान लिया जाए
- समचित्तत्व
- प्रिय-अप्रिय दोनों में मन की स्थिर समता
- इष्टानिष्टोपपत्ति
- मनचाही और अनचाही परिस्थितियों का आना
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 13.5 – ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः
- गीता 13.6 – महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च
- गीता 13.7 – इच्छा द्वेषः सुखं
- गीता 13.8 – अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्
- गीता 13.9 – इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव
- गीता 13.11 – मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी
- गीता 13.12 – अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्
- गीता 13.13 – ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते
- गीता 13.14 – सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्
- गीता 13.15 – सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्