श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 9
अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
indriyārtheṣu vairāgyamanahaṃkāra eva ca .
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam ॥
अर्थ
इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और दुःख में दोषों का बार-बार विचार करना —
शब्दार्थ
- इन्द्रियार्थेषु – इन्द्रियों के विषयों में
- वैराग्यम् – वैराग्य, आसक्ति का अभाव
- अनहंकारः – अहंकार का अभाव, ‘मैं श्रेष्ठ हूँ’ के भाव से मुक्ति
- एव च – और भी
- जन्म – जन्म
- मृत्यु – मृत्यु
- जरा – वृद्धावस्था
- व्याधि – रोग
- दुःख – दुःख, पीड़ा
- दोष – दोष, कमियाँ
- अनुदर्शनम् – बार-बार देखना, चिन्तन करना
अन्वय
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहंकारः एव च जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ।
व्याख्या
ज्ञान के लक्षणों की माला आगे बढ़ती है। ‘इन्द्रियार्थेषु वैराग्य’ — इन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य — का अर्थ संसार से घृणा नहीं, बल्कि यह समझ है कि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के सुख क्षणिक हैं और आत्मा की प्यास नहीं बुझा सकते। दूसरे अध्याय (2.59) में भगवान ने कहा था कि विषयों से दूर रहने पर भी रस बना रहता है, जो परम-तत्त्व के दर्शन से ही मिटता है। सच्चा वैराग्य वही है जो भीतर के रस को भी शान्त कर दे।
‘अनहंकार’ पिछले श्लोक के ‘अमानित्व’ से भी गहरा है। अमानित्व में दूसरों से सम्मान की चाह छूटती है, जबकि अनहंकार में स्वयं को कर्ता, भोक्ता और श्रेष्ठ मानने का भाव ही ढीला पड़ता है। छठे-सातवें श्लोक में अहंकार को क्षेत्र का अंग बताया गया था; अब ज्ञान का साधक उससे तादात्म्य छोड़ने लगता है।
श्लोक का दूसरा भाग एक गहन साधना बताता है — ‘जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शन’, अर्थात् जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और दुःख में निहित दोषों का बार-बार चिन्तन। ‘अनु-दर्शन’ का अर्थ एक बार देखना नहीं, निरन्तर स्मरण रखना है। शंकराचार्य बताते हैं कि जन्म में गर्भवास की पीड़ा, मृत्यु में वियोग का कष्ट, बुढ़ापे में शक्ति और स्मृति का क्षय, रोग में शरीर की असहायता — इन पर विचार करने से विषयों के प्रति वैराग्य स्वतः उत्पन्न होता है और मन अन्तर्मुख होता है। कुछ टीकाकार ‘दुःखदोष’ को ‘इन सबका दुःख-रूप दोष’ भी पढ़ते हैं।
यह चिन्तन निराशावाद नहीं है। भगवान बुद्ध के जीवन की प्रसिद्ध कथा में भी वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति के दर्शन से ही वैराग्य जागा था। कठोपनिषद में नचिकेता भी यमराज के दिए भोगों को ‘श्वोभाव’ — कल तक रहने वाले — कहकर ठुकरा देता है। रामानुजाचार्य कहते हैं कि देह से जुड़े इन दोषों का विचार साधक को देह से भिन्न आत्मा की खोज की ओर प्रेरित करता है। मध्वाचार्य इसे भगवान की शरण की आवश्यकता का बोध मानते हैं।
जब जीवन की नश्वरता स्पष्ट दिखने लगती है, तब मनुष्य छोटी बातों पर झगड़ना छोड़ देता है और जो सचमुच शाश्वत है, उसकी ओर मुड़ता है। इसीलिए यह स्मरण भय नहीं, बल्कि स्पष्टता और करुणा देता है।
प्रसंग
आठवें श्लोक में ज्ञान के पहले नौ लक्षण बताए गए। यहाँ वैराग्य, अनहंकार और जीवन के दुःखों पर चिन्तन — ये तीन लक्षण जोड़े गए। अगले श्लोक में अनासक्ति और प्रिय-अप्रिय में समचित्तता जैसे लक्षणों के साथ यह सूची आगे बढ़ती है।
जीवन-शिक्षा
इन्द्रिय-सुखों का आनन्द लेते हुए भी उनकी क्षणिकता को याद रखें। जीवन की नश्वरता पर शान्त चिन्तन मन को छोटे झगड़ों और अहंकार से मुक्त करता है। जो बीतने वाला है, उसके पीछे भागने के बजाय जो शाश्वत है, उसकी ओर समय लगाएँ।
मुख्य शब्द
- वैराग्य
- विषयों के प्रति आसक्ति और रस का अभाव
- अनहंकार
- कर्तापन और श्रेष्ठता के अहंभाव से मुक्ति
- दोषानुदर्शन
- जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और दुःख के दोषों का निरन्तर चिन्तन
- इन्द्रियार्थ
- इन्द्रियों के विषय — शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 13.4 – तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च
- गीता 13.5 – ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः
- गीता 13.6 – महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च
- गीता 13.7 – इच्छा द्वेषः सुखं
- गीता 13.8 – अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्
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- गीता 13.11 – मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी
- गीता 13.12 – अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्
- गीता 13.13 – ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते
- गीता 13.14 – सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्