श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 8
अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam .
ācāryopāsanaṃ śaucaṃ sthairyamātmavinigrahaḥ ॥
अर्थ
मान का अभाव, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा-उपासना, पवित्रता, स्थिरता और आत्म-संयम —
शब्दार्थ
- अमानित्वम् – मान-सम्मान की इच्छा का अभाव, विनम्रता
- अदम्भित्वम् – दम्भ अर्थात् दिखावे का अभाव
- अहिंसा – मन, वाणी और शरीर से किसी को कष्ट न देना
- क्षान्तिः – क्षमा, सहनशीलता
- आर्जवम् – सरलता, मन-वाणी-कर्म की एकरूपता
- आचार्योपासनम् – गुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा और सान्निध्य
- शौचम् – बाहरी और भीतरी पवित्रता
- स्थैर्यम् – स्थिरता, साधना में दृढ़ता
- आत्मविनिग्रहः – शरीर, इन्द्रियों और मन का संयम
अन्वय
अमानित्वम् अदम्भित्वम् अहिंसा क्षान्तिः आर्जवम् आचार्योपासनम् शौचम् स्थैर्यम् आत्मविनिग्रहः ।
व्याख्या
क्षेत्र का वर्णन पूरा करके भगवान अब अर्जुन के प्रश्न के ‘ज्ञान’ वाले भाग का उत्तर देते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि वे ज्ञान की परिभाषा किसी दार्शनिक सूत्र से नहीं, बल्कि चरित्र के गुणों से करते हैं। आठवें से बारहवें श्लोक तक बीस गुणों की यह माला चलती है, और अन्त में भगवान कहते हैं — यही ज्ञान है, इसके विपरीत जो है, वह अज्ञान है। अर्थात् गीता की दृष्टि में ज्ञान केवल जानकारी नहीं, जीवन का रूपान्तरण है।
सूची का आरम्भ ‘अमानित्व’ से होता है — मान-सम्मान की लालसा का न होना। यह संयोग नहीं है; अहंकार ही आत्म-ज्ञान का सबसे बड़ा बाधक है, इसलिए विनम्रता पहला द्वार है। ‘अदम्भित्व’ का अर्थ है अपने धर्म या गुणों का दिखावा न करना। ‘अहिंसा’ में मन, वाणी और कर्म — तीनों से किसी प्राणी को पीड़ा न पहुँचाना सम्मिलित है। ‘क्षान्ति’ दूसरों के अपराध को सहन करने की शक्ति है, और ‘आर्जव’ वह सरलता है जिसमें भीतर और बाहर एक-सा हो।
‘आचार्योपासन’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। उपनिषद कहते हैं — ‘आचार्यवान् पुरुषो वेद’, जिसके पास आचार्य है, वही जानता है। चौथे अध्याय (4.34) में भी भगवान ने प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा द्वारा ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त करने का उपदेश दिया था। ‘शौच’ में शरीर की स्वच्छता और मन की निर्मलता दोनों आते हैं। ‘स्थैर्य’ साधना में डटे रहने का धैर्य है, और ‘आत्मविनिग्रह’ शरीर-मन को उच्च लक्ष्य की ओर अनुशासित करना है।
शंकराचार्य इन गुणों को ‘ज्ञान के साधन’ मानते हैं — इनके द्वारा अन्तःकरण शुद्ध होता है और आत्म-ज्ञान का उदय होता है; इसलिए इन्हें भी ‘ज्ञान’ कहा गया। रामानुजाचार्य इन्हें आत्म-साक्षात्कार के लिए आवश्यक गुण बताते हैं, जो साधक को देह से भिन्न आत्मा के अनुभव के योग्य बनाते हैं। मध्वाचार्य भी इन्हें भगवद्-ज्ञान की पूर्व-शर्त के रूप में देखते हैं। सभी आचार्यों का निष्कर्ष एक है — चरित्र के बिना तत्त्वज्ञान केवल शब्दों का खेल है।
आज के युग में, जहाँ ज्ञान को प्रायः सूचना या डिग्री से मापा जाता है, यह श्लोक एक दर्पण है। विद्वान वह नहीं जो बहुत जानता है, बल्कि वह है जिसमें विनम्रता, क्षमा, सरलता और संयम खिल उठे हों।
प्रसंग
सातवें श्लोक में क्षेत्र का वर्णन समाप्त हुआ। यहाँ से बारहवें श्लोक तक ज्ञान के बीस लक्षण बताए जाते हैं; इस श्लोक में पहले नौ गुण हैं। अगले श्लोक में वैराग्य, अनहंकार और जीवन के दुःखों पर चिन्तन — ये गुण जोड़े जाते हैं।
जीवन-शिक्षा
ज्ञान की परीक्षा व्यवहार में होती है, बहस में नहीं। प्रशंसा की भूख छोड़ें, दिखावे से बचें, किसी को कष्ट न दें और दूसरों की भूलों को क्षमा करें। अच्छे गुरु का सान्निध्य खोजें और जीवन में भीतर-बाहर की पवित्रता तथा संयम लाएँ।
मुख्य शब्द
- अमानित्व
- मान-सम्मान की चाह का अभाव, सच्ची विनम्रता
- अदम्भित्व
- दिखावा और पाखण्ड न करना
- आर्जव
- सरलता, मन-वाणी-कर्म की एकता
- आचार्योपासन
- गुरु की श्रद्धा सहित सेवा और उनसे शिक्षा ग्रहण
- आत्मविनिग्रह
- शरीर, इन्द्रियों और मन पर संयम
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 13.3 – क्षेत्रज्ञं चापि मां
- गीता 13.4 – तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च
- गीता 13.5 – ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः
- गीता 13.6 – महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च
- गीता 13.7 – इच्छा द्वेषः सुखं
- गीता 13.9 – इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव
- गीता 13.10 – असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु
- गीता 13.11 – मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी
- गीता 13.12 – अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्
- गीता 13.13 – ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते