श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 17
अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam .
bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca ॥
अर्थ
वह अविभाजित है, फिर भी प्राणियों में विभाजित-सा स्थित प्रतीत होता है। वह जानने योग्य ब्रह्म सब प्राणियों का पालन करने वाला, उन्हें अपने में लीन करने वाला और उन्हें उत्पन्न करने वाला है
शब्दार्थ
- अविभक्तम् – अविभाजित, अखंड
- च – और
- भूतेषु – प्राणियों में
- विभक्तम् – बँटा हुआ
- इव – के समान, मानो
- स्थितम् – स्थित
- भूतभर्तृ – प्राणियों का भरण-पोषण करने वाला
- तत् – वह
- ज्ञेयम् – जानने योग्य
- ग्रसिष्णु – निगलने वाला, प्रलय में लीन करने वाला
- प्रभविष्णु – उत्पन्न करने वाला
अन्वय
(तत्) अविभक्तम् च भूतेषु विभक्तम् इव च स्थितम्; तत् ज्ञेयम् भूत-भर्तृ च, ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ।
व्याख्या
ब्रह्म एक और अखंड है, फिर भी अनगिनत शरीरों में वह अलग-अलग-सा दिखाई देता है। ‘विभक्तमिव’ — ‘मानो बँटा हुआ’ — इस ‘इव’ शब्द में पूरा रहस्य छिपा है। जैसे एक ही आकाश असंख्य घड़ों में अलग-अलग दिखता है, या एक ही सूर्य अनेक जलपात्रों में अनेक प्रतिबिंबों के रूप में चमकता है, वैसे ही एक चेतना अनेक प्राणियों में अलग प्रतीत होती है। आचार्य शंकर के लिए यह विभाजन केवल उपाधिकृत है, वास्तविक नहीं।
रामानुजाचार्य यहाँ आत्मा के स्वरूप की समानता पर बल देते हैं: देव, मनुष्य, पशु आदि शरीरों के भेद से आत्माएँ भिन्न दिखती हैं, पर ज्ञानस्वरूपता में वे सब एक समान हैं। मध्वाचार्य भगवान को सब जीवों में अंतर्यामी रूप से एक ही, अविभाजित स्थित मानते हैं।
दूसरी पंक्ति में ब्रह्म के तीन कार्य बताए गए हैं — ‘भूतभर्तृ’ अर्थात् स्थिति काल में सबका पालक, ‘ग्रसिष्णु’ अर्थात् प्रलय में सबको अपने में समेट लेने वाला, और ‘प्रभविष्णु’ अर्थात् सृष्टि के समय सबको प्रकट करने वाला। जैसे रस्सी में कल्पित सर्प उसी में उत्पन्न होता, टिकता और लीन होता है, वैसे ही जगत् ब्रह्म में। तैत्तिरीय उपनिषद् भी कहता है: जिससे ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे जीते हैं और जिसमें लीन होते हैं, वही ब्रह्म है।
प्रसंग
13.16 में ब्रह्म को भीतर-बाहर और दूर-निकट बताया गया; यहाँ उसकी एकता में अनेकता की प्रतीति और सृष्टि-स्थिति-प्रलय के कारण रूप का वर्णन है। अगले श्लोक (13.18) में उसे ज्योतियों की ज्योति और हृदय में स्थित बताकर ज्ञेय का वर्णन पूर्ण होता है।
जीवन-शिक्षा
सबमें एक ही चेतना को देखने वाला किसी को पराया नहीं मानता। जो सबका पालन करता है, उसी पर भरोसा रखकर जीवन के आरंभ, मध्य और अंत को शांति से स्वीकार करें।
मुख्य शब्द
- अविभक्त
- अखंड, जिसका वास्तव में विभाजन नहीं होता
- विभक्तमिव
- मानो विभाजित — केवल प्रतीति में भेद
- ग्रसिष्णु-प्रभविष्णु
- प्रलय में लीन करने वाला और सृष्टि में प्रकट करने वाला
- भूतभर्तृ
- सब प्राणियों का पालक
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 13.12 – अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्
- गीता 13.13 – ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते
- गीता 13.14 – सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्
- गीता 13.15 – सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्
- गीता 13.16 – बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव
- गीता 13.18 – ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते
- गीता 13.19 – इति क्षेत्रं तथा
- गीता 13.20 – प्रकृतिं पुरुषं चैव
- गीता 13.21 – कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते
- गीता 13.22 – पुरुषः प्रकृतिस्थो हि