भगवद् गीता वर्ल्ड

उद्धव जी

श्रीकृष्ण के सखा और मंत्री उद्धव जी, जो गोपियों को संदेश देने गए और स्वयं प्रेम-भक्ति का पाठ सीखकर लौटे।

उद्धव जी यदुवंश के महान ज्ञानी, श्रीकृष्ण के अंतरंग सखा और द्वारका में उनके विश्वस्त मंत्री थे। श्रीमद्भागवत उन्हें देवगुरु बृहस्पति का शिष्य और अत्यंत बुद्धिमान बताता है। उनका स्वभाव और रूप भी श्रीकृष्ण से इतना मिलता था कि वे भगवान के सबसे प्रिय भक्तों में गिने जाते हैं।

मथुरा आने के बाद श्रीकृष्ण ने उद्धव जी को व्रज भेजा, ताकि वे नंद बाबा, यशोदा मैया और विरह में व्याकुल गोपियों को सांत्वना दें। उद्धव जी ज्ञान और योग का उपदेश लेकर गए थे, परंतु व्रज में उन्होंने ऐसा प्रेम देखा जो किसी उपदेश की सीमा में नहीं आता। जब वे गोपियों से बात कर रहे थे, तब एक भौंरा वहाँ आ गया, और एक गोपी (परंपरा के अनुसार श्री राधा) ने उस भौंरे को श्रीकृष्ण का दूत मानकर उससे प्रेम-भरे उलाहने के वचन कहे। यही प्रसंग "भ्रमर गीत" के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे आगे चलकर सूरदास और नंददास जैसे कवियों ने अपनी रचनाओं में गाया।

गोपियों की भक्ति देखकर उद्धव जी का ज्ञान का अभिमान पिघल गया। उन्होंने प्रार्थना की कि वे वृंदावन में कोई लता, झाड़ी या तृण बनें, ताकि गोपियों के चरणों की धूल उन पर पड़ती रहे।

बहुत समय बाद, जब भगवान इस धरती से अपनी लीला समेटने वाले थे, उद्धव जी ने उनके साथ चलने की प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें वैराग्य, भक्ति और आत्मज्ञान का गहन उपदेश दिया, जो श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में है और "उद्धव गीता" कहलाता है। इसमें अवधूत के चौबीस गुरुओं की प्रसिद्ध कथा भी है। इसके बाद भगवान ने उन्हें बदरिकाश्रम जाकर साधना करने की आज्ञा दी। उद्धव जी हमें सिखाते हैं कि ज्ञान की पूर्णता विनम्र प्रेम में है।

Relation
सखा, भक्त और मंत्री
Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 46–47; Canto 11

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