रुक्मिणी जी और अष्ट पटरानियाँ
लक्ष्मी स्वरूपा रुक्मिणी जी, सत्यभामा, जाम्बवती और द्वारकाधीश की अष्ट पटरानियाँ।
द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियाँ "अष्ट भार्या" या अष्ट पटरानियाँ कहलाती हैं: रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, नाग्नजिती (सत्या), भद्रा और लक्ष्मणा।
इनमें प्रथम रुक्मिणी जी हैं, जिन्हें स्वयं देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। वे विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थीं और बचपन से ही श्रीकृष्ण के गुण सुनकर उन्हें ही पति मान चुकी थीं। उनके भाई रुक्मी उनका विवाह शिशुपाल से करना चाहते थे। तब रुक्मिणी जी ने एक ब्राह्मण के हाथ श्रीकृष्ण को पत्र भेजा। श्रीकृष्ण विवाह से पहले देवी अंबिका के मंदिर से उन्हें अपने रथ में ले गए और विरोधी राजाओं को परास्त किया। परंपरा के अनुसार उनका विवाह गुजरात के माधवपुर में हुआ, जहाँ आज भी इस प्रसंग का मेला लगता है।
सत्यभामा जी राजा सत्राजित की पुत्री थीं। स्यमंतक मणि के प्रसंग में श्रीकृष्ण पर लगा झूठा आरोप दूर होने के बाद उनका विवाह हुआ। इसी मणि की खोज में श्रीकृष्ण का ऋक्षराज जाम्बवान से युद्ध हुआ, जिन्होंने अंत में भगवान को पहचानकर अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें सौंप दी। सत्यभामा जी नरकासुर के विरुद्ध युद्ध में श्रीकृष्ण के साथ गई थीं। कालिंदी सूर्यदेव की पुत्री थीं, जिन्होंने श्रीकृष्ण को पाने के लिए तप किया। मित्रविंदा अवंती की राजकुमारी थीं, नाग्नजिती कोसल के राजा नग्नजित की पुत्री थीं, जिन्हें पाने के लिए श्रीकृष्ण ने सात बलवान बैलों को एक साथ वश में किया, भद्रा कैकय की राजकुमारी थीं, और लक्ष्मणा मद्र की राजकुमारी थीं, जिनके स्वयंवर में श्रीकृष्ण ने मत्स्य-लक्ष्य भेदा।
प्रचलित परंपरा में "तुलाभार" की कथा प्रसिद्ध है: जब सत्यभामा जी के सारे स्वर्ण-आभूषण भी श्रीकृष्ण के बराबर न तुल सके, तब रुक्मिणी जी ने प्रेम से एक तुलसी-पत्र रखा और तराजू बराबर हो गया। यह कथा बताती है कि भगवान धन से नहीं, भक्ति से तौले जाते हैं।
- Relation
- पटरानियाँ
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 52–58