सुदामा: बचपन के सखा
गुरुकुल के सखा, निर्धन ब्राह्मण सुदामा, जिनके मुट्ठी भर चिउड़े को द्वारकाधीश ने प्रेम से स्वीकार किया।
सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के सखा थे। श्रीमद्भागवत (दशम स्कंध) में उन्हें केवल "एक ब्राह्मण सखा" कहा गया है, परंतु प्रचलित परंपरा में वे सुदामा नाम से प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण, बलराम जी और सुदामा अवंतिपुर (उज्जैन) में गुरु सांदीपनि के आश्रम में साथ पढ़े थे। एक बार गुरुमाता के लिए वन में लकड़ियाँ लेने गए दोनों मित्र भयंकर आँधी-वर्षा में रात भर फँसे रहे थे; सुबह गुरु जी ने उन्हें खोजकर हृदय से आशीर्वाद दिया।
सुदामा विद्वान, संतोषी और भगवान के भक्त थे, परंतु अत्यंत निर्धन थे। उनकी पत्नी ने आग्रह किया कि वे अपने मित्र द्वारकाधीश से मिलने जाएँ। उपहार के लिए घर में कुछ न था, इसलिए वे पड़ोसियों से माँगकर कुछ मुट्ठी चिउड़े (पोहे) एक पुराने कपड़े में बाँधकर ले गए।
द्वारका में श्रीकृष्ण ने दूर से ही उन्हें देखा, तुरंत उठकर गले लगाया, अपने आसन पर बिठाया, अपने हाथों से उनके चरण धोए, और रुक्मिणी जी ने स्वयं उन्हें पंखा झला। दोनों मित्र गुरुकुल के दिनों को याद करते रहे। संकोचवश सुदामा चिउड़े की पोटली छिपा रहे थे, पर श्रीकृष्ण ने उसे छीनकर एक मुट्ठी बड़े प्रेम से खा ली। परंपरा के अनुसार जब वे दूसरी मुट्ठी लेने लगे, तब रुक्मिणी जी ने उनका हाथ थाम लिया।
सुदामा कुछ माँगे बिना ही लौट आए, भगवान के प्रेम से ही तृप्त होकर। घर पहुँचे तो देखा कि उनकी झोपड़ी के स्थान पर भव्य महल खड़ा है। फिर भी वे जीवन भर विनम्र और विरक्त बने रहे। परंपरा के अनुसार गुजरात का पोरबंदर ही सुदामा जी की नगरी "सुदामापुरी" है। यह कथा गीता (9.26) के वचन को साकार करती है कि भक्त प्रेम से पत्र, पुष्प, फल या जल जो भी अर्पित करे, भगवान उसे स्वीकार करते हैं।
- Relation
- बचपन के सखा
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 80–81