सुभद्रा और द्रौपदी
श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा और उनकी परम भक्त सखी द्रौपदी, जिनकी पुकार पर भगवान सदा दौड़े आए।
सुभद्रा जी वसुदेव जी की पुत्री और श्रीकृष्ण तथा बलराम जी की छोटी बहन थीं। उनका विवाह अर्जुन से हुआ, जिसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन का साथ दिया। उनके पुत्र वीर अभिमन्यु थे, जिनके पुत्र परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनने का सौभाग्य मिला। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में सुभद्रा जी अपने दोनों भाइयों, जगन्नाथ जी और बलभद्र जी, के बीच विराजमान हैं, और रथयात्रा में तीनों भाई-बहन साथ निकलते हैं।
द्रौपदी जी राजा द्रुपद के यज्ञ की अग्नि से प्रकट हुई थीं। श्यामवर्ण होने के कारण उन्हें "कृष्णा" भी कहा जाता है, और पांचाल की राजकुमारी होने से "पांचाली"। वे श्रीकृष्ण को अपना सखा और रक्षक मानती थीं, और श्रीकृष्ण उन्हें बहन जैसा स्नेह देते थे। प्रचलित परंपरा के अनुसार एक बार श्रीकृष्ण की उँगली कट गई, तो द्रौपदी जी ने तुरंत अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर बाँध दिया, और भगवान ने उस प्रेम को कभी नहीं भुलाया। प्रचलित परंपरा के अनुसार ही जब द्यूतसभा में उनका अपमान किया जा रहा था और किसी ने रक्षा नहीं की, तब उन्होंने हृदय से श्रीकृष्ण को पुकारा, और उनका वस्त्र अनंत होता गया।
महाभारत के वनपर्व में अक्षय पात्र की कथा है। सूर्यदेव ने युधिष्ठिर को एक ऐसा पात्र दिया था, जिसमें से प्रतिदिन तब तक भोजन मिलता रहता जब तक द्रौपदी जी स्वयं भोजन न कर लें। दुर्योधन की प्रेरणा से महर्षि दुर्वासा अपने हजारों शिष्यों के साथ ठीक उस समय पहुँचे जब द्रौपदी जी भोजन कर चुकी थीं, और स्नान करने चले गए। शाप के भय से व्याकुल द्रौपदी जी ने श्रीकृष्ण का स्मरण किया। भगवान तुरंत आए और भूख लगने की बात कहकर पात्र माँगा। उसमें चिपका साग का एक पत्ता खाकर उन्होंने कहा कि इससे विश्वात्मा तृप्त हों। उसी क्षण नदी पर स्नान कर रहे दुर्वासा और उनके शिष्यों का पेट भर गया, और वे बिना लौटे ही चले गए।
सुभद्रा जी और द्रौपदी जी दोनों यह सिखाती हैं कि भगवान से स्नेह का संबंध जोड़ने वाले को वे कभी अकेला नहीं छोड़ते।
- Relation
- बहन और प्रिय सखी
- Source
- Mahabharata (Adi Parva, Sabha Parva, Vana Parva)