भगवद् गीता वर्ल्ड

देवकी और वसुदेव

कंस के कारागार में अपार कष्ट सहकर भी धर्म और विश्वास पर अडिग रहे श्रीकृष्ण के जन्मदाता माता-पिता।

देवकी जी और वसुदेव जी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदाता माता-पिता हैं। देवकी जी राजा उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री थीं, और कंस उन्हें अपनी बहन के समान प्रेम करता था। विवाह के बाद जब कंस स्वयं उनका रथ हाँक रहा था, तब आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान तुम्हारा वध करेगी। कंस उसी क्षण देवकी जी को मारने को उद्यत हो गया। तब वसुदेव जी ने बड़ी बुद्धिमानी से उसे समझाया और वचन दिया कि वे अपनी हर संतान उसे सौंप देंगे।

वसुदेव जी ने अपना वचन निभाया। बाद में कंस ने दोनों को कारागार में डाल दिया और उनकी छह संतानों का वध कर दिया। सातवें गर्भ को योगमाया ने रोहिणी जी के गर्भ में स्थापित कर दिया, जो बलराम जी के रूप में जन्मे। फिर भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को भगवान शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। माता-पिता ने उनकी स्तुति की, और भगवान ने बताया कि पूर्व जन्मों में वे पृश्नि और सुतपा तथा अदिति और कश्यप थे, जिन्हें उन्होंने पुत्र रूप में आने का वरदान दिया था। फिर उनकी प्रार्थना पर भगवान साधारण शिशु बन गए।

उसी क्षण बेड़ियाँ खुल गईं, पहरेदार सो गए और द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव जी शिशु को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल ले गए, जहाँ उन्होंने उसे यशोदा मैया के पास सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को ले आए। कंस ने जब उस कन्या को मारना चाहा, तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में देवी के रूप में प्रकट हुई और बोली कि तुम्हें मारने वाला कहीं और जन्म ले चुका है।

वर्षों बाद कंस का वध करके श्रीकृष्ण और बलराम जी ने अपने माता-पिता को बंधन से मुक्त किया और उनके चरणों में प्रणाम किया। देवकी जी और वसुदेव जी का जीवन धैर्य, सत्यनिष्ठा और दुःख के अंधकार में भी भगवान पर अटूट विश्वास की शिक्षा देता है।

Relation
जन्मदाता माता-पिता
Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 1–4

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