श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 7
अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām .
kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham ॥
अर्थ
हे कौन्तेय! कल्प के अंत में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें फिर से उत्पन्न करता हूँ
शब्दार्थ
- सर्वभूतानि – सब प्राणी
- कौन्तेय – हे कुंतीपुत्र अर्जुन
- प्रकृतिम् – प्रकृति को, मूल कारण में
- यान्ति – प्राप्त होते हैं, लीन होते हैं
- मामिकाम् – मेरी
- कल्पक्षये – कल्प के अंत में, प्रलय के समय
- पुनः – फिर
- तानि – उन्हें
- कल्पादौ – कल्प के आरंभ में
- विसृजामि – रचता हूँ, प्रकट करता हूँ
- अहम् – मैं
अन्वय
कौन्तेय, कल्पक्षये सर्वभूतानि मामिकां प्रकृतिं यान्ति; कल्पादौ पुनः तानि अहं विसृजामि ।
व्याख्या
अब तक भगवान् ने बताया कि प्राणी उनमें कैसे स्थित हैं। अब वे काल की दृष्टि से इस संबंध को समझाते हैं — सृष्टि और प्रलय का चक्र। भारतीय दर्शन में सृष्टि एक बार की घटना नहीं, बल्कि अनादि चक्र है। ब्रह्मा के एक दिन को ‘कल्प’ कहते हैं; उसके अंत में प्रलय होता है और नए कल्प के आरंभ में फिर सृष्टि होती है, जैसा आठवें अध्याय के सत्रहवें-उन्नीसवें श्लोकों में भी कहा गया है।
‘प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्’ — प्रलय के समय सब प्राणी ‘मेरी प्रकृति’ में लीन हो जाते हैं। ध्यान दें, भगवान् ‘मामिकाम्’ कहते हैं — प्रकृति स्वतंत्र नहीं, भगवान् की ही है। जैसे रात में वृक्ष बीज में और बीज भूमि में सुप्त रहता है, वैसे ही प्रलय में सारी सृष्टि अपने सूक्ष्म कारण-रूप में भगवान् की प्रकृति में विश्राम करती है। प्राणियों के कर्म-संस्कार भी नष्ट नहीं होते, वे बीज रूप में सुरक्षित रहते हैं।
‘कल्पादौ विसृजाम्यहम्’ — नए कल्प के आरंभ में भगवान् उन्हीं प्राणियों को उनके कर्मों के अनुसार फिर से प्रकट करते हैं। आचार्य रामानुज कहते हैं कि प्रलय में प्राणी नाम-रूप से रहित होकर अत्यंत सूक्ष्म अवस्था में भगवान् के शरीर-रूप प्रकृति में रहते हैं, और सृष्टि में फिर नाम-रूप ग्रहण करते हैं।
इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि, स्थिति और लय — तीनों के मूल में एक ही परमात्मा हैं। जो सब कुछ आता-जाता है, वह परिवर्तनशील है; जो इस आने-जाने का आधार है, वही नित्य है। बुद्धिमान् साधक परिवर्तनशील वस्तुओं में नहीं, बल्कि उस नित्य आधार में अपना मन लगाता है।
प्रसंग
छठे श्लोक में स्थान की दृष्टि से प्राणियों का भगवान् में होना बताया गया। यहाँ काल की दृष्टि से — प्रलय में लीन होना और सृष्टि में प्रकट होना — बताया गया है। अगले श्लोक में भगवान् बताएँगे कि वे अपनी प्रकृति को वश में करके यह सृष्टि कैसे करते हैं।
जीवन-शिक्षा
संसार की हर वस्तु आती है और जाती है; केवल भगवान् ही स्थायी आधार हैं। इसलिए बदलती वस्तुओं के खोने पर अत्यधिक शोक न करें, बल्कि उस अविनाशी सत्य में अपना विश्वास और प्रेम स्थिर करें।
मुख्य शब्द
- कल्प
- ब्रह्मा का एक दिन, सृष्टि का एक चक्र
- कल्पक्षय
- कल्प का अंत, प्रलय
- मामिका प्रकृति
- भगवान् की अपनी प्रकृति, जगत् का मूल कारण
- विसर्ग
- सृष्टि, प्राणियों को प्रकट करना
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 9.2 – राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्
- गीता 9.3 – अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य
- गीता 9.4 – मया ततमिदं सर्वं
- गीता 9.5 – न च मत्स्थानि
- गीता 9.6 – यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः
- गीता 9.8 – प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि
- गीता 9.9 – न च मां
- गीता 9.10 – मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते
- गीता 9.11 – अवजानन्ति मां मूढा
- गीता 9.12 – मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना