श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 11
अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
avajānanti māṃ mūḍhā mānuṣīṃ tanumāśritam .
paraṃ bhāvamajānanto mama bhūtamaheśvaram ॥
अर्थ
मूर्ख लोग मुझे मनुष्य शरीर धारण किए हुए देखकर मेरा अनादर करते हैं, क्योंकि वे सब प्राणियों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते
शब्दार्थ
- अवजानन्ति – अवहेलना करते हैं, तुच्छ समझते हैं
- माम् – मुझे
- मूढाः – मूढ़, विवेकहीन लोग
- मानुषीम् – मनुष्य की
- तनुम् – देह को
- आश्रितम् – धारण किए हुए
- परम् – परम, सर्वोच्च
- भावम् – स्वरूप, तत्त्व
- अजानन्तः – न जानते हुए
- मम – मेरे
- भूतमहेश्वरम् – सब प्राणियों के महान् ईश्वर
अन्वय
मम भूतमहेश्वरं परं भावम् अजानन्तः मूढाः मानुषीं तनुम् आश्रितं माम् अवजानन्ति ।
व्याख्या
अब तक भगवान् ने अपने विराट्, सर्वव्यापी और प्रकृति के अध्यक्ष स्वरूप का वर्णन किया। अब वे एक ऐसी भूल की ओर संकेत करते हैं जो बहुत से लोग करते हैं — ‘अवजानन्ति मां मूढाः मानुषीं तनुमाश्रितम्’। जब भगवान् कृपा करके मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं, तो अज्ञानी लोग उन्हें साधारण मनुष्य समझकर उनकी उपेक्षा करते हैं।
इसका कारण बताया गया है — ‘परं भावम् अजानन्तः’ — वे भगवान् के परम भाव को नहीं जानते। वे केवल बाहरी शरीर को देखते हैं — खाना, चलना, बोलना, रथ हाँकना — और सोचते हैं कि यह भी हमारे जैसा ही है। दुर्योधन, शिशुपाल और कंस ने श्रीकृष्ण को इसी दृष्टि से देखा। जबकि उसी शरीर के भीतर ‘भूतमहेश्वर’ — सब प्राणियों के महान् स्वामी — विराजमान थे।
आचार्य रामानुज कहते हैं कि भगवान् करुणावश, सबके लिए सुलभ होने के लिए, मनुष्य रूप धारण करते हैं; परंतु मूढ़ लोग इसी सुलभता को उनकी साधारणता मान बैठते हैं। जिस गुण के कारण भगवान् को और अधिक पूजना चाहिए था, उसी को देखकर वे उनका अनादर करते हैं। चौथे अध्याय में भगवान् कह चुके हैं कि वे अपनी प्रकृति को वश में करके अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं — उनका शरीर कर्म-बंधन से बना हुआ नहीं है।
इस श्लोक का एक व्यापक अर्थ भी है। हम अक्सर सरल रूप में आए दिव्य को पहचान नहीं पाते — किसी साधारण दिखने वाले संत में, किसी सरल प्रार्थना में या किसी छोटे से अनुभव में। बाहरी रूप से आगे देखने की दृष्टि ही सच्ची भक्ति की पहचान है।
प्रसंग
पिछले श्लोकों में भगवान् ने अपने परम, सर्वव्यापी और प्रकृति के अध्यक्ष स्वरूप का वर्णन किया। यहाँ वे बताते हैं कि इसे न जानने वाले उनके अवतार रूप को कैसे तुच्छ समझते हैं। अगले श्लोक में ऐसे लोगों के स्वभाव और उनकी व्यर्थ आशाओं का वर्णन है।
जीवन-शिक्षा
बाहरी रूप देखकर किसी के मूल्य का निर्णय न करें। दिव्यता अक्सर सरल और साधारण रूप में आती है। श्रद्धा और विवेक की आँख ही उसे पहचान पाती है।
मुख्य शब्द
- मानुषी तनु
- मनुष्य शरीर, अवतार का रूप
- परम भाव
- भगवान् का सर्वोच्च वास्तविक स्वरूप
- भूतमहेश्वर
- सब प्राणियों के महान् ईश्वर
- अवज्ञा
- अनादर, उपेक्षा
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 9.6 – यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः
- गीता 9.7 – सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं
- गीता 9.8 – प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि
- गीता 9.9 – न च मां
- गीता 9.10 – मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते
- गीता 9.12 – मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना
- गीता 9.13 – महात्मानस्तु मां पार्थ
- गीता 9.14 – सततं कीर्तयन्तो मां
- गीता 9.15 – ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो
- गीता 9.16 – अहं क्रतुरहं यज्ञः