श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 2
अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
rājavidyā rājaguhyaṃ pavitramidamuttamam .
pratyakṣāvagamaṃ dharmyaṃ susukhaṃ kartumavyayam ॥
अर्थ
यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब रहस्यों का राजा, अत्यंत पवित्र और उत्तम है। इसका फल प्रत्यक्ष अनुभव में आता है, यह धर्मसम्मत है, करने में बहुत सुगम है और अविनाशी है
शब्दार्थ
- राजविद्या – सब विद्याओं का राजा
- राजगुह्यम् – सब गोपनीय विषयों का राजा
- पवित्रम् – पवित्र करने वाला
- इदम् – यह
- उत्तमम् – सर्वश्रेष्ठ
- प्रत्यक्षावगमम् – प्रत्यक्ष अनुभव से जाना जाने वाला
- धर्म्यम् – धर्म से युक्त, धर्मसम्मत
- सुसुखम् – अत्यंत सुखपूर्वक
- कर्तुम् – करने में, आचरण में
- अव्ययम् – अविनाशी, कभी नष्ट न होने वाला
अन्वय
इदं राजविद्या राजगुह्यम् उत्तमं पवित्रं प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं कर्तुं सुसुखम् अव्ययम् (च अस्ति) ।
व्याख्या
इस श्लोक में भगवान् उस ज्ञान की आठ विशेषताएँ गिनाते हैं, जिसे वे इस अध्याय में देने वाले हैं। पहली दो हैं — ‘राजविद्या’ और ‘राजगुह्य’। जैसे राजा प्रजा में श्रेष्ठ होता है, वैसे ही यह विद्या सब विद्याओं में श्रेष्ठ है और सब रहस्यों में सबसे बड़ा रहस्य है। संसार की अन्य विद्याएँ जीविका या सुख-सुविधा देती हैं, परंतु यह विद्या स्वयं परमात्मा तक पहुँचाती है। इसी श्लोक के आधार पर इस अध्याय का नाम ‘राजविद्या-राजगुह्य योग’ पड़ा है।
तीसरी और चौथी विशेषता है — ‘पवित्रम् उत्तमम्’। यह ज्ञान सर्वोत्तम पवित्र करने वाला है। आचार्य शंकर कहते हैं कि यह अनेक जन्मों के संचित कर्मों को भी जड़ सहित भस्म कर देता है। गंगा-स्नान, तीर्थ और व्रत बाहरी शुद्धि करते हैं, किंतु भगवान् का यह तत्त्वज्ञान अंतःकरण को भीतर से निर्मल कर देता है।
पाँचवीं विशेषता ‘प्रत्यक्षावगमम्’ है — इसका फल किसी दूर के स्वर्ग में नहीं, बल्कि यहीं प्रत्यक्ष अनुभव में आता है। जैसे भोजन करने वाले को तृप्ति का अनुभव स्वयं हो जाता है, वैसे ही भक्त और ज्ञानी को शांति और आनंद का अनुभव इसी जीवन में होता है। छठी विशेषता ‘धर्म्यम्’ है — यह धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि सब धर्मों का सार है।
सातवीं विशेषता ‘कर्तुं सुसुखम्’ है — यह करने में अत्यंत सरल है। इसके लिए बहुत धन, कठोर तप या विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं; प्रेम से एक पत्ता या जल अर्पित करना भी पर्याप्त है, जैसा आगे छब्बीसवें श्लोक में कहा जाएगा। आठवीं विशेषता ‘अव्ययम्’ है — इसका फल कभी नष्ट नहीं होता। सकाम कर्मों का फल भोगकर समाप्त हो जाता है, पर इस ज्ञान से प्राप्त भगवत्प्राप्ति शाश्वत है।
इस प्रकार यह श्लोक साधक के मन में उत्साह जगाता है: जो मार्ग सबसे ऊँचा भी है और सबसे सरल भी, उसे कौन नहीं अपनाना चाहेगा? यही इस विद्या की अद्भुत महिमा है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में भगवान् ने ‘गुह्यतम’ ज्ञान कहने की प्रतिज्ञा की थी। इस श्लोक में वे उसकी महिमा का वर्णन करते हैं, ताकि अर्जुन के मन में उसके प्रति श्रद्धा और जिज्ञासा जगे। अगले श्लोक में वे बताएँगे कि ऐसी महान् विद्या में श्रद्धा न रखने वालों की क्या गति होती है।
जीवन-शिक्षा
आध्यात्मिक जीवन कठिन और दूर की वस्तु नहीं है; भगवान् का मार्ग सबसे ऊँचा होते हुए भी सबसे सरल है। इसका फल इसी जीवन में शांति और आनंद के रूप में अनुभव किया जा सकता है। हमें इस ‘राजविद्या’ को अपने दैनिक जीवन का केंद्र बनाना चाहिए।
मुख्य शब्द
- राजविद्या
- विद्याओं में राजा, सर्वश्रेष्ठ ज्ञान
- राजगुह्य
- रहस्यों में राजा, परम गोपनीय
- प्रत्यक्षावगम
- जिसका फल प्रत्यक्ष अनुभव में आए
- धर्म्य
- धर्म के अनुकूल
- अव्यय
- अविनाशी, जिसका फल कभी क्षीण न हो
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 9.1 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 9.3 – अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य
- गीता 9.4 – मया ततमिदं सर्वं
- गीता 9.5 – न च मत्स्थानि
- गीता 9.6 – यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः
- गीता 9.7 – सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं
- गीता 9.8 – प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि
- गीता 9.9 – न च मां
- गीता 9.10 – मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते
- गीता 9.11 – अवजानन्ति मां मूढा