श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 12
अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ .
rākṣasīmāsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ ॥
अर्थ
ऐसे लोगों की आशाएँ व्यर्थ, कर्म व्यर्थ और ज्ञान व्यर्थ होता है; वे विवेकहीन होकर मोह में डालने वाली राक्षसी और आसुरी प्रकृति का आश्रय लिए रहते हैं
शब्दार्थ
- मोघाशाः – व्यर्थ आशा वाले
- मोघकर्माणः – व्यर्थ कर्म वाले
- मोघज्ञानाः – व्यर्थ ज्ञान वाले
- विचेतसः – विवेकहीन, भ्रमित चित्त वाले
- राक्षसीम् – राक्षसी (तामसी, हिंसक)
- आसुरीम् – आसुरी (राजसी, भोगप्रधान)
- च – और
- एव – ही
- प्रकृतिम् – स्वभाव को
- मोहिनीम् – मोह में डालने वाली
- श्रिताः – आश्रित, उसके अधीन
अन्वय
(ते) मोघाशाः मोघकर्माणः मोघज्ञानाः विचेतसः मोहिनीं राक्षसीम् आसुरीं च एव प्रकृतिं श्रिताः (भवन्ति) ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में जिन मूढ़ लोगों का उल्लेख हुआ, उनका स्वभाव यहाँ चार विशेषणों से बताया गया है। पहला — ‘मोघाशाः’ — उनकी आशाएँ व्यर्थ होती हैं। वे भगवान् को छोड़कर संसार की नश्वर वस्तुओं से स्थायी सुख की आशा करते हैं, जो कभी पूरी नहीं हो सकती, जैसे रेगिस्तान में मृगतृष्णा से प्यास बुझाने की आशा।
दूसरा — ‘मोघकर्माणः’ — उनके कर्म व्यर्थ होते हैं। आचार्य शंकर कहते हैं कि भगवान् का अनादर करने वालों के यज्ञ, दान आदि अच्छे कर्म भी अपना वास्तविक फल नहीं देते, क्योंकि उनका लक्ष्य गलत है। तीसरा — ‘मोघज्ञानाः’ — उनका ज्ञान भी व्यर्थ है। वे बहुत कुछ जान सकते हैं, पर वह ज्ञान उन्हें शांति और मुक्ति की ओर नहीं ले जाता। चौथा — ‘विचेतसः’ — उनका विवेक नष्ट हो चुका होता है।
इस दशा का मूल कारण है — ‘राक्षसीम् आसुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः’। राक्षसी प्रकृति तमोगुण-प्रधान है — क्रोध, हिंसा और दूसरों को पीड़ा देने की प्रवृत्ति। आसुरी प्रकृति रजोगुण-प्रधान है — अहंकार, काम और लोभ। ये दोनों ‘मोहिनी’ हैं, अर्थात् व्यक्ति को अपने ही हित के बारे में भ्रमित कर देती हैं। सोलहवें अध्याय में इस आसुरी संपदा का विस्तार से वर्णन है।
यह श्लोक किसी व्यक्ति की निंदा करने के लिए नहीं, बल्कि सावधान करने के लिए है। हम सबके भीतर कभी-कभी ये प्रवृत्तियाँ जागती हैं। जब हमारी आशाएँ बार-बार टूटती हैं और कर्म खोखले लगते हैं, तो हमें देखना चाहिए कि कहीं हम अहंकार और लोभ के अधीन तो नहीं हो गए।
प्रसंग
ग्यारहवें श्लोक में भगवान् के मानव रूप का अनादर करने वाले मूढ़ लोगों की बात कही गई। यहाँ उनके स्वभाव और उसके परिणाम बताए गए हैं। अगले श्लोक में इसके विपरीत दैवी प्रकृति वाले महात्माओं का वर्णन आरंभ होता है।
जीवन-शिक्षा
जब जीवन का लक्ष्य केवल नश्वर वस्तुएँ हों, तो आशा, कर्म और ज्ञान — तीनों खोखले हो जाते हैं। क्रोध, अहंकार और लोभ हमारे विवेक को ढक देते हैं। अपने भीतर इन प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें दैवी गुणों से बदलने का प्रयास करें।
मुख्य शब्द
- मोघ
- व्यर्थ, निष्फल
- राक्षसी प्रकृति
- तमोगुण-प्रधान, क्रूर और हिंसक स्वभाव
- आसुरी प्रकृति
- रजोगुण-प्रधान, काम और अहंकार से भरा स्वभाव
- विचेतस्
- विवेकहीन, भ्रमित चित्त वाला
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 9.7 – सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं
- गीता 9.8 – प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि
- गीता 9.9 – न च मां
- गीता 9.10 – मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते
- गीता 9.11 – अवजानन्ति मां मूढा
- गीता 9.13 – महात्मानस्तु मां पार्थ
- गीता 9.14 – सततं कीर्तयन्तो मां
- गीता 9.15 – ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो
- गीता 9.16 – अहं क्रतुरहं यज्ञः
- गीता 9.17 – पिताहमस्य जगतो माता