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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 17

अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

pitāhamasya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ .
vedyaṃ pavitramoṃkāra ṛksāma yajureva ca ॥

अर्थ

मैं ही इस सम्पूर्ण जगत् का पिता, माता, धारण-पोषण करने वाला और पितामह हूँ। जानने योग्य पवित्र तत्त्व, ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ

शब्दार्थ

  • पिता – पिता
  • अहम् – मैं
  • अस्य – इस
  • जगतः – जगत् का
  • माता – माता
  • धाता – धारण-पोषण करने वाला, कर्मफल-विधाता
  • पितामहः – पितामह, पिता का भी पिता
  • वेद्यम् – जानने योग्य
  • पवित्रम् – पवित्र करने वाला
  • ओंकारः – ॐकार, प्रणव
  • ऋक् – ऋग्वेद
  • साम – सामवेद
  • यजुः – यजुर्वेद
  • एव – ही
  • च – और

अन्वय

अहम् अस्य जगतः पिता, माता, धाता, पितामहः, वेद्यं, पवित्रम्, ओंकारः, ऋक्, साम, यजुः एव च (अस्मि) ।

व्याख्या

यज्ञ के अंगों के बाद भगवान् अब अपने संबंधों का वर्णन करते हैं, जो इस अध्याय को अत्यंत आत्मीय बना देता है। ‘पिताहमस्य जगतः’ — मैं इस जगत् का पिता हूँ, जो बीज रूप में सबका कारण है। ‘माता’ — मैं ही माता हूँ, जो गर्भ में धारण करके जन्म देती है और ममता से पालती है। भगवान् में पिता का संरक्षण और माता का वात्सल्य — दोनों एक साथ हैं।

‘धाता’ — धारण-पोषण करने वाला। आचार्य शंकर इसका अर्थ कर्मफल-विधाता भी करते हैं — जो प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल देता है। ‘पितामह’ — पिता का भी पिता। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी जिनसे उत्पन्न हुए, वे भगवान् सबके पितामह हैं। इस प्रकार भगवान् कहते हैं कि सृष्टि के हर स्तर पर, हर पीढ़ी के मूल में वे ही हैं।

‘वेद्यं पवित्रम्’ — वे ही जानने योग्य एकमात्र तत्त्व हैं और वे ही सबको पवित्र करने वाले हैं। सारे शास्त्र और साधनाएँ अंततः उन्हीं को जानने के लिए हैं। ‘ओंकार’ — प्रणव, जो परब्रह्म का सबसे पवित्र प्रतीक है और जिसमें सब वेद बीज रूप में समाए हुए हैं। ‘ऋक्, साम, यजुः’ — तीनों वेद भी वे ही हैं, क्योंकि वेद उन्हीं का ज्ञान और उन्हीं की वाणी हैं।

इस श्लोक का भक्त पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जो भगवान् को केवल विश्व का दूरस्थ नियंता समझता है, उसके लिए यह श्लोक बताता है कि वे हमारे सबसे निकट के संबंधी — माता और पिता — हैं। बालक जैसे निःसंकोच माता-पिता के पास जाता है, वैसे ही भक्त निःसंकोच भगवान् के पास जा सकता है।

प्रसंग

सोलहवें श्लोक में भगवान् ने स्वयं को यज्ञ के सब अंगों के रूप में बताया। यहाँ वे जगत् के माता-पिता और वेदों के रूप में अपना परिचय देते हैं। अगले श्लोक में वे स्वयं को जीव की गति, भर्ता, शरण और सुहृत् के रूप में बताएँगे।

जीवन-शिक्षा

भगवान् केवल दूर बैठे नियंता नहीं, हमारे सच्चे माता-पिता हैं। उनके प्रति बालक जैसा सरल विश्वास और प्रेम रखें। जब हमें यह भाव दृढ़ हो जाए, तो जीवन की कोई भी परिस्थिति हमें अनाथ नहीं बना सकती।

मुख्य शब्द

धाता
धारण-पोषण करने वाला, कर्मफल का विधाता
पितामह
पिता का पिता, ब्रह्मा के भी जनक
वेद्य
जानने योग्य परम तत्त्व
ओंकार
ॐ, प्रणव — परब्रह्म का प्रतीक

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