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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 19

अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca .
amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna ॥

अर्थ

हे अर्जुन! मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। मैं ही अमृत हूँ और मृत्यु भी, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ

शब्दार्थ

  • तपामि – तपता हूँ, ताप देता हूँ
  • अहम् – मैं
  • अहम् – मैं
  • वर्षम् – वर्षा को
  • निगृह्णामि – रोकता हूँ
  • उत्सृजामि – बरसाता हूँ, छोड़ता हूँ
  • च – और
  • अमृतम् – अमृत, जीवन, मोक्ष
  • च – और
  • एव – ही
  • मृत्युः – मृत्यु
  • च – और
  • सत् – सत्, व्यक्त (कार्य)
  • असत् – असत्, अव्यक्त (कारण)
  • च – और
  • अहम् – मैं
  • अर्जुन – हे अर्जुन

अन्वय

अर्जुन, अहं तपामि, अहं वर्षं निगृह्णामि उत्सृजामि च; अहम् अमृतं च एव मृत्युः च, सत् असत् च (अस्मि) ।

व्याख्या

इस श्लोक के साथ ‘विश्वतोमुख’ भगवान् का वर्णन अपने चरम पर पहुँचता है। अब वे प्रकृति की उन महान् शक्तियों का नाम लेते हैं जिन पर सारा जीवन निर्भर है। ‘तपाम्यहम्’ — मैं ही सूर्य बनकर तपता हूँ। सूर्य का ताप ही ऋतुओं को चलाता है, अन्न पकाता है और समुद्र के जल को भाप बनाकर बादलों में ले जाता है।

‘वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च’ — मैं ही वर्षा को रोकता हूँ और फिर बरसाता हूँ। आचार्य शंकर समझाते हैं कि गर्मी के आठ महीनों में सूर्य किरणों से जल को खींचकर रोकता है, और वर्षा ऋतु में उसे फिर बरसा देता है। अकाल और बाढ़, दोनों का संतुलन उसी एक शक्ति के हाथ में है।

‘अमृतं चैव मृत्युश्च’ — मैं ही अमृत हूँ और मैं ही मृत्यु। जीवन देना और जीवन लेना — दोनों भगवान् की ही शक्तियाँ हैं। देवताओं का अमृत, प्राणियों का जीवन और ज्ञानियों का मोक्ष — सब वे ही हैं; और काल बनकर सबको समेटने वाली मृत्यु भी वे ही हैं। यह भाव भक्त को मृत्यु के भय से मुक्त करता है, क्योंकि मृत्यु भी उसी प्रियतम का एक रूप है।

‘सदसच्चाहम्’ — सत् और असत् भी मैं ही हूँ। आचार्य शंकर के अनुसार ‘सत्’ व्यक्त कार्य-जगत् है और ‘असत्’ उसका अव्यक्त कारण। आचार्य रामानुज कहते हैं कि वर्तमान में स्थित वस्तुएँ ‘सत्’ और भूत-भविष्य की वस्तुएँ ‘असत्’ हैं — दोनों भगवान् के ही शरीर हैं। तात्पर्य यह कि अस्तित्व का कोई भी पक्ष भगवान् से बाहर नहीं है।

प्रसंग

सोलहवें से अठारहवें श्लोक तक भगवान् ने यज्ञ, संबंधों और आश्रय के रूप में अपना वर्णन किया। यहाँ वे प्रकृति की शक्तियों और अस्तित्व के सब पक्षों के रूप में अपना वर्णन पूरा करते हैं। अगले श्लोक से वे बताएँगे कि सकाम भाव से वैदिक कर्म करने वाले स्वर्ग पाकर भी फिर लौट आते हैं।

जीवन-शिक्षा

धूप और वर्षा, जन्म और मृत्यु — जीवन के सब पहलू एक ही दिव्य शक्ति के खेल हैं। जब हम सुख-दुःख दोनों में भगवान् का हाथ देखते हैं, तो भय और शिकायत कम हो जाती है और कृतज्ञता बढ़ती है।

मुख्य शब्द

अमृत
अमरता, जीवन, मोक्ष
मृत्यु
मृत्यु, संहार की शक्ति
सत्
व्यक्त, विद्यमान जगत्
असत्
अव्यक्त कारण, अप्रकट अवस्था

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