भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 18

अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

gatirbhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛt .
prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃ nidhānaṃ bījamavyayam ॥

अर्थ

मैं ही सबकी परम गति, भरण-पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी, निवास-स्थान, शरण और निःस्वार्थ मित्र हूँ; मैं ही उत्पत्ति और प्रलय, सबका आधार, निधान और अविनाशी बीज हूँ

शब्दार्थ

  • गतिः – परम गंतव्य, लक्ष्य
  • भर्ता – भरण-पोषण करने वाला
  • प्रभुः – स्वामी, नियंता
  • साक्षी – सबके शुभ-अशुभ को देखने वाला
  • निवासः – निवास-स्थान
  • शरणम् – आश्रय, रक्षक
  • सुहृत् – बिना स्वार्थ के हित करने वाला मित्र
  • प्रभवः – उत्पत्ति का कारण
  • प्रलयः – लय का स्थान
  • स्थानम् – आधार, स्थिति का स्थान
  • निधानम् – निधि, सबको सुरक्षित रखने का भंडार
  • बीजम् – बीज, मूल कारण
  • अव्ययम् – अविनाशी

अन्वय

(अहं) गतिः, भर्ता, प्रभुः, साक्षी, निवासः, शरणं, सुहृत्, प्रभवः, प्रलयः, स्थानं, निधानम्, अव्ययं बीजम् (च अस्मि) ।

व्याख्या

यह श्लोक भगवान् के बारह स्वरूपों की एक सुंदर माला है, जो जीव के साथ उनके हर संबंध को प्रकट करती है। ‘गतिः’ — वे ही सबकी अंतिम मंजिल हैं; सब यात्राएँ अंततः उन्हीं में समाप्त होती हैं। ‘भर्ता’ — वे पालनहार हैं, जो हर प्राणी के लिए अन्न-जल और साधन जुटाते हैं। ‘प्रभुः’ — वे स्वामी हैं, सबके नियंता। ‘साक्षी’ — वे हमारे हर विचार और कर्म के साक्षी हैं; उनसे कुछ छिपा नहीं।

‘निवासः’ — वे सबका निवास हैं, जिनमें सारी सृष्टि रहती है। ‘शरणम्’ — वे शरण हैं, संकट में पीड़ितों के रक्षक। आचार्य शंकर कहते हैं कि शरण वह है जो शरणागत का दुःख दूर करता है। ‘सुहृत्’ — वे बिना किसी स्वार्थ के हित करने वाले मित्र हैं। संसार के मित्र प्रायः किसी अपेक्षा से मित्रता करते हैं, पर भगवान् बदले में कुछ नहीं चाहते। पाँचवें अध्याय के अंतिम श्लोक में भी उन्होंने स्वयं को ‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ कहा था।

‘प्रभवः प्रलयः’ — वे ही सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के स्थान हैं। ‘स्थानम्’ — वे ही स्थिति के आधार हैं। ‘निधानम्’ — वे निधि हैं; प्रलय में प्राणी और उनके कर्म-संस्कार उन्हीं में सुरक्षित रहते हैं, जैसे खजाने में धन। ‘बीजम् अव्ययम्’ — वे अविनाशी बीज हैं। साधारण बीज वृक्ष बनकर स्वयं नष्ट हो जाता है, पर भगवान् रूपी बीज से अनंत सृष्टियाँ होती हैं, फिर भी वह कभी क्षीण नहीं होता।

इस श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर भक्त को अनुभव होता है कि जीवन की हर आवश्यकता — लक्ष्य, पोषण, संरक्षण, मित्रता, आश्रय — भगवान् में पूर्ण होती है। जिसने उन्हें पा लिया, उसे किसी और की आवश्यकता नहीं रहती।

प्रसंग

सत्रहवें श्लोक में भगवान् ने स्वयं को जगत् के माता-पिता और वेदों के रूप में बताया। यहाँ वे जीव की गति, भर्ता, शरण, सुहृत् आदि संबंधों का वर्णन करते हैं। अगले श्लोक में वे प्रकृति की शक्तियों — ताप, वर्षा, अमृत और मृत्यु — के रूप में अपना वर्णन करेंगे।

जीवन-शिक्षा

हम संसार में लक्ष्य, सुरक्षा, आश्रय और सच्चे मित्र की खोज में भटकते हैं; ये सब एक ही स्थान पर — भगवान् में — मिलते हैं। उन्हें अपना निःस्वार्थ सुहृत् मानकर अपने सुख-दुःख उनके साथ बाँटें।

मुख्य शब्द

गति
परम लक्ष्य, अंतिम गंतव्य
शरण
आश्रय, दुःख दूर करने वाला रक्षक
सुहृत्
बिना स्वार्थ के उपकार करने वाला मित्र
निधान
निधि, प्रलय में सबको सुरक्षित रखने का स्थान
अव्यय बीज
अविनाशी मूल कारण

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