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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 13

अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ .
samprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan ॥

अर्थ

शरीर, सिर और गर्दन को सीधा, सम और अचल रखते हुए स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर और इधर-उधर दिशाओं को न देखते हुए —

शब्दार्थ

  • समम् – सीधा, एक रेखा में
  • कायशिरोग्रीवम् – शरीर, सिर और गर्दन को
  • धारयन् – धारण करते हुए, रखते हुए
  • अचलम् – अचल, न हिलाते हुए
  • स्थिरः – स्थिर होकर
  • सम्प्रेक्ष्य – भली-भाँति देखकर, दृष्टि टिकाकर
  • नासिकाग्रम् – नाक के अग्रभाग को
  • स्वम् – अपनी
  • दिशः – दिशाओं को
  • च – और
  • अनवलोकयन् – न देखते हुए

अन्वय

कायशिरोग्रीवं समम् अचलं धारयन् स्थिरः (सन्) स्वं नासिकाग्रं सम्प्रेक्ष्य दिशः च अनवलोकयन् —

व्याख्या

अब भगवान् ध्यान की शारीरिक मुद्रा का सूक्ष्म निर्देश देते हैं। पहला निर्देश है — शरीर (धड़), सिर और गर्दन एक सीधी रेखा में हों। झुकी हुई पीठ से श्वास बाधित होता है, आलस्य और नींद आती है; बहुत तनी हुई पीठ से थकान होती है। सीधी, सहज रीढ़ जागरूकता का आधार है। योग-परम्परा में माना जाता है कि सीधी रीढ़ से प्राण का प्रवाह सहज होता है और मन सतर्क रहता है।

दूसरा निर्देश है ‘अचलं स्थिरः’ — शरीर अचल हो। ध्यान में बार-बार हिलना, खुजलाना, पैर बदलना मन को भी अस्थिर करता है। आरम्भ में यह कठिन लगता है, पर अभ्यास से शरीर कुछ समय के लिए मूर्ति की तरह शांत रहना सीख जाता है, और तब मन भी शांत होने लगता है।

तीसरा निर्देश दृष्टि के विषय में है — ‘संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वम्’। आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ नाक की नोक को घूरना नहीं है; यहाँ ‘इव’ (मानो) का भाव समझना चाहिए। अर्थात् आँखें अधखुली और दृष्टि नीचे की ओर, मानो नासिका के अग्रभाग पर टिकी हो। इससे आँखें इधर-उधर नहीं भटकतीं, और पूरी बंद आँखों से आने वाली नींद भी नहीं आती। मुख्य बात भीतर की ओर ध्यान है, बाहर की नोक नहीं।

चौथा निर्देश — ‘दिशश्चानवलोकयन्’, दिशाओं में न देखना। आँखों की चंचलता मन की चंचलता का प्रतिबिंब है। जब आँखें स्थिर होती हैं, तो मन भी स्थिर होने लगता है। इस प्रकार शरीर की सही मुद्रा मन की सही अवस्था के लिए भूमि तैयार करती है।

प्रसंग

6.12 में आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करने की बात हुई; यह श्लोक शरीर की मुद्रा और दृष्टि का वर्णन करता है। अगला श्लोक (6.14) इसी वाक्य को पूरा करते हुए मन की भीतरी अवस्था — शांति, निर्भयता, ब्रह्मचर्य और भगवान् में चित्त — बताता है।

जीवन-शिक्षा

ध्यान या प्रार्थना में बैठते समय रीढ़ सीधी, शरीर स्थिर और आँखें शांत रखें। शरीर को सँभाल लेना मन को सँभालने का पहला कदम है। दिनभर के काम में भी अच्छी मुद्रा सतर्कता और ऊर्जा बनाए रखती है।

मुख्य शब्द

कायशिरोग्रीव
धड़, सिर और गर्दन
नासिकाग्र
नाक का अग्रभाग; यहाँ अधखुली, नीचे झुकी दृष्टि का संकेत
अनवलोकयन्
इधर-उधर न देखते हुए

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