श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 15
अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī niyatamānasaḥ .
śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati ॥
अर्थ
इस प्रकार मन को निरंतर (परमात्मा में) लगाते हुए, संयमित मन वाला योगी मुझमें स्थित रहने वाली, निर्वाण की पराकाष्ठा रूप परम शांति को प्राप्त होता है
शब्दार्थ
- युञ्जन् – लगाते हुए, जोड़ते हुए
- एवम् – इस प्रकार
- सदा – सदा, निरंतर
- आत्मानम् – मन को
- योगी – योगी
- नियतमानसः – संयमित मन वाला
- शान्तिम् – शांति को
- निर्वाणपरमाम् – निर्वाण (मोक्ष) जिसकी पराकाष्ठा है
- मत्संस्थाम् – मुझमें स्थित
- अधिगच्छति – प्राप्त करता है
अन्वय
एवं सदा आत्मानं युञ्जन् नियतमानसः योगी मत्संस्थां निर्वाणपरमां शान्तिम् अधिगच्छति ।
व्याख्या
ध्यान की विधि बताने के बाद भगवान् उसका फल बताते हैं। ‘एवम्’ — इस प्रकार, अर्थात् जो विधि 6.10–14 में बताई गई — उसके अनुसार ‘सदा’ अभ्यास करने वाला योगी परम शांति प्राप्त करता है। ‘सदा’ शब्द महत्वपूर्ण है; एक-दो बार ध्यान करने से नहीं, निरंतर अभ्यास से यह फल मिलता है।
यह शांति साधारण शांति नहीं है। संसार में भी शांति के क्षण आते हैं — कोई इच्छा पूरी होने पर, थकान के बाद विश्राम में, सुंदर दृश्य देखकर। पर वे क्षणिक हैं और बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर हैं। भगवान् जिस शांति की बात करते हैं, वह ‘निर्वाणपरमा’ है — जिसकी पराकाष्ठा निर्वाण, अर्थात् मोक्ष या संसार-बंधन की पूर्ण निवृत्ति है। यह दीपक के बुझने जैसी शून्यता नहीं, बल्कि सब अशांति के बुझ जाने से प्रकट होने वाली पूर्णता है।
और यह शांति ‘मत्संस्था’ है — भगवान् में स्थित। अर्थात् योगी की शांति का आधार कोई वस्तु या परिस्थिति नहीं, स्वयं परमात्मा है। आचार्य शंकर कहते हैं कि यह शांति मुझमें — परमेश्वर में — स्थित है, और इसकी चरम अवस्था मोक्ष है। आचार्य रामानुज इसे भगवान् के सान्निध्य में प्राप्त होने वाली परम आनंदमयी शांति कहते हैं।
इस प्रकार ध्यान का अंतिम फल केवल मानसिक स्वास्थ्य नहीं, भगवत्-प्राप्ति है। अगले श्लोकों में भगवान् बताएँगे कि इस साधना को सफल बनाने के लिए दैनिक जीवन में कैसा संतुलन चाहिए।
प्रसंग
6.10–14 में ध्यान की विधि बताई गई; यह श्लोक उसका फल बताता है। अगले दो श्लोकों (6.16–17) में भगवान् आहार, निद्रा और कर्म में संतुलन — ‘युक्त’ जीवन — की आवश्यकता बताते हैं।
जीवन-शिक्षा
सच्ची शांति किसी चीज़ के मिलने से नहीं, मन के ईश्वर में टिकने से आती है। नियमित, धैर्यपूर्ण अभ्यास से ही यह शांति स्थायी बनती है। प्रतिदिन थोड़ा, पर बिना नागा, ध्यान करें।
मुख्य शब्द
- नियतमानस
- जिसका मन संयम में है
- निर्वाण
- संसार-बंधन की पूर्ण निवृत्ति, मोक्ष
- मत्संस्था
- भगवान् में स्थित (शांति)
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 6.10 – योगी युञ्जीत सततमात्मानं
- गीता 6.11 – शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य
- गीता 6.12 – तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा
- गीता 6.13 – समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं
- गीता 6.14 – प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः
- गीता 6.16 – नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न
- गीता 6.17 – युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु
- गीता 6.18 – यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते
- गीता 6.19 – यथा दीपो निवातस्थो
- गीता 6.20 – यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं