भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 8

अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ .
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ॥

अर्थ

जिसका अंतःकरण ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो कूटस्थ (निर्विकार) है, जिसने इन्द्रियों को भली-भाँति जीत लिया है और जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं — वह योगी ‘युक्त’ (योग में स्थित) कहा जाता है

शब्दार्थ

  • ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा – ज्ञान (शास्त्रीय समझ) और विज्ञान (अनुभव) से तृप्त अंतःकरण वाला
  • कूटस्थः – निहाई की तरह अचल, निर्विकार
  • विजितेन्द्रियः – जिसने इन्द्रियों को पूर्णतः जीत लिया
  • युक्तः – योगयुक्त, योग में स्थित
  • इति – ऐसा
  • उच्यते – कहा जाता है
  • योगी – योगी
  • समलोष्टाश्मकाञ्चनः – जिसके लिए ढेला, पत्थर और सोना समान हैं

अन्वय

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थः विजितेन्द्रियः समलोष्टाश्मकाञ्चनः योगी युक्तः इति उच्यते ।

व्याख्या

इस श्लोक में ‘युक्त’ योगी के चार लक्षण बताए गए हैं। पहला — वह ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है। ‘ज्ञान’ का अर्थ है शास्त्र और गुरु से प्राप्त सत्य की स्पष्ट समझ, और ‘विज्ञान’ का अर्थ है उस सत्य का अपने अनुभव में उतर आना। केवल पढ़ा हुआ ज्ञान भूख नहीं मिटाता; जब वह अनुभव बन जाता है, तब अंतःकरण तृप्त हो जाता है और बाहर की वस्तुओं की लालसा मिट जाती है।

दूसरा लक्षण है ‘कूटस्थ’। ‘कूट’ लोहार की निहाई को कहते हैं, जिस पर हथौड़े पड़ते रहते हैं पर वह स्वयं नहीं बदलती। इसी प्रकार योगी पर जीवन की चोटें पड़ती रहती हैं, पर उसका भीतरी स्वरूप विकार-रहित रहता है। तीसरा लक्षण है ‘विजितेन्द्रिय’ — इन्द्रियाँ उसकी सेवक हैं, स्वामी नहीं।

चौथा लक्षण अत्यंत व्यावहारिक है — मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना उसके लिए समान हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वह इनका भेद नहीं पहचानता; अर्थ यह है कि सोना देखकर उसके मन में लोभ नहीं जागता और ढेला देखकर तिरस्कार नहीं। आचार्य शंकर कहते हैं कि आत्मज्ञान की तृप्ति के कारण उसके लिए इनमें से कोई भी वस्तु ग्रहण या त्याग योग्य नहीं रह जाती।

ऐसा व्यक्ति ‘युक्त’ कहलाता है — अर्थात् वह योग से जुड़ चुका है। यह श्लोक वस्तुओं के प्रति समता बताता है; अगला श्लोक व्यक्तियों के प्रति समता बताएगा।

प्रसंग

6.7 में द्वन्द्वों के बीच समता का वर्णन हुआ। यहाँ वस्तुओं के प्रति समता और आंतरिक तृप्ति का वर्णन है। अगला श्लोक (6.9) मित्र-शत्रु, साधु-पापी — सब मनुष्यों के प्रति समबुद्धि की बात करता है।

जीवन-शिक्षा

धन और वस्तुएँ जीवन के लिए उपयोगी हैं, पर वे हमारी शांति का माप नहीं होनी चाहिए। जब समझ अनुभव में बदलती है, तभी सच्ची संतुष्टि आती है। कुछ पढ़ें तो उसे जीने का प्रयास भी करें।

मुख्य शब्द

ज्ञान
शास्त्र और गुरु से प्राप्त तत्त्व की समझ
विज्ञान
उस ज्ञान का प्रत्यक्ष अनुभव
कूटस्थ
निहाई के समान अचल, निर्विकार
युक्त
योग में भली-भाँति स्थित

इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक

श्रीकृष्ण से जुड़ी सामग्री

लोकप्रिय गीता श्लोक