श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 14
अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ .
manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ ॥
अर्थ
शांत अंतःकरण वाला, भय से रहित, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित होकर, मन को संयमित करके, मुझमें चित्त लगाकर और मुझे ही परम लक्ष्य मानकर योगी सावधान होकर ध्यान में बैठे
शब्दार्थ
- प्रशान्तात्मा – पूर्णतः शांत अंतःकरण वाला
- विगतभीः – भय से रहित
- ब्रह्मचारिव्रते – ब्रह्मचर्य के व्रत में
- स्थितः – स्थित होकर
- मनः – मन को
- संयम्य – संयमित करके
- मच्चित्तः – मुझमें चित्त लगाने वाला
- युक्तः – सावधान, योगयुक्त
- आसीत – बैठे
- मत्परः – मुझे ही परम लक्ष्य मानने वाला
अन्वय
प्रशान्तात्मा विगतभीः ब्रह्मचारिव्रते स्थितः (सन्) मनः संयम्य मच्चित्तः मत्परः युक्तः आसीत ।
व्याख्या
शरीर की मुद्रा बताने के बाद भगवान् अब मन की अवस्था बताते हैं, जो ध्यान का वास्तविक हृदय है। पहला गुण है ‘प्रशान्तात्मा’ — अंतःकरण शांत हो। ध्यान में बैठने से पहले मन की उत्तेजना, क्रोध या उथल-पुथल को शांत करना आवश्यक है; कुछ गहरी श्वासें, प्रार्थना या मंत्र-जप इसमें सहायक होते हैं।
दूसरा गुण है ‘विगतभीः’ — भय से मुक्त। ध्यान में जब मन भीतर गहरे उतरता है, तो कई बार अज्ञात का भय, अकेलेपन का भय या शरीर-संबंधी चिंता उभरती है। भय मन को फिर बाहर की ओर खींच लाता है। जिसे गुरु, शास्त्र और भगवान् पर भरोसा है, वह इस भय को पार कर जाता है।
तीसरा गुण है ‘ब्रह्मचारिव्रते स्थितः’ — ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित। पारम्परिक रूप से इसका अर्थ इन्द्रिय-संयम, विशेषकर काम-वासना पर नियंत्रण है, जिससे ऊर्जा का अपव्यय नहीं होता। गृहस्थ के लिए आचार्यों ने इसका अर्थ संयमित, मर्यादित जीवन लिया है। ‘ब्रह्मचर्य’ शब्द का गहरा अर्थ है ‘ब्रह्म में विचरण करना’ — मन को परम सत्य की ओर गतिशील रखना।
अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात — ‘मच्चित्तो मत्परः’। यहाँ भगवान् ध्यान के लक्ष्य को स्पष्ट करते हैं: मन मुझमें लगे, मैं ही परम लक्ष्य रहूँ। गीता का ध्यान केवल मन को खाली करने की तकनीक नहीं, भगवान् के प्रति समर्पित एकाग्रता है। आचार्य रामानुज इस पर विशेष बल देते हैं कि ध्यान का आश्रय भगवान् हैं, और उनमें चित्त लगाने से ही मन सहजता से वश में होता है, जैसे आग से धातु का मैल जल जाता है। आचार्य शंकर ‘मत्परः’ का अर्थ करते हैं — जिसका परम आश्रय मैं (परमेश्वर) हूँ।
इस प्रकार 6.10–14 तक ध्यान का पूरा विधान है: एकांत, आसन, मुद्रा, दृष्टि, मन की शांति, निर्भयता, संयम और भगवान् में चित्त। अगला श्लोक इस अभ्यास का फल बताता है।
प्रसंग
6.13 में शरीर की मुद्रा बताई गई; यह श्लोक ध्यान के समय की भीतरी अवस्था और लक्ष्य (भगवान्) बताकर विधि को पूर्ण करता है। अगले श्लोक (6.15) में इस अभ्यास का फल — निर्वाणरूपी परम शांति — बताया गया है।
जीवन-शिक्षा
ध्यान केवल शरीर को बिठाना नहीं, मन को किसी पवित्र लक्ष्य पर टिकाना है। भय और बेचैनी छोड़कर, संयमित जीवन के साथ, अपने इष्ट या परम सत्य को केंद्र बनाकर बैठें। जीवन में भी एक ऊँचा लक्ष्य मन को बिखरने से बचाता है।
मुख्य शब्द
- विगतभी
- भय से रहित
- ब्रह्मचारिव्रत
- इन्द्रिय-संयम और मर्यादित जीवन का व्रत
- मच्चित्त
- भगवान् में चित्त लगाने वाला
- मत्पर
- भगवान् को ही परम लक्ष्य मानने वाला
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 6.9 – सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु
- गीता 6.10 – योगी युञ्जीत सततमात्मानं
- गीता 6.11 – शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य
- गीता 6.12 – तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा
- गीता 6.13 – समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं
- गीता 6.15 – युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी
- गीता 6.16 – नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न
- गीता 6.17 – युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु
- गीता 6.18 – यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते
- गीता 6.19 – यथा दीपो निवातस्थो