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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 34

अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā .
upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninastattvadarśinaḥ ॥

अर्थ

उस ज्ञान को तुम (तत्त्वदर्शी गुरु के पास जाकर) विनम्र प्रणाम से, जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों से और सेवा से जानो। वे तत्त्व को साक्षात् देखने वाले ज्ञानी तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे

शब्दार्थ

  • तत् – उस (ज्ञान) को
  • विद्धि – जानो, प्राप्त करो
  • प्रणिपातेन – विनम्र होकर साष्टांग प्रणाम करने से, पूर्ण समर्पण से
  • परिप्रश्नेन – भली-भाँति, जिज्ञासापूर्वक प्रश्न करने से
  • सेवया – सेवा करने से
  • उपदेक्ष्यन्ति – उपदेश देंगे
  • ते – तुम्हें
  • ज्ञानम् – ज्ञान का
  • ज्ञानिनः – ज्ञानीजन (शास्त्र को जानने वाले)
  • तत्त्वदर्शिनः – तत्त्व को साक्षात् अनुभव करने वाले

अन्वय

तत् (ज्ञानम्) प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया विद्धि; तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ते ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में भगवान ने ज्ञान-यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ बताया और कहा कि सब कर्म ज्ञान में परिणत होते हैं। अब स्वाभाविक प्रश्न है — यह ज्ञान मिले कैसे? यह श्लोक उसका उत्तर देता है, और यह गीता में गुरु-शिष्य परम्परा के महत्त्व का सबसे स्पष्ट कथन है। भगवान स्वयं गुरु हैं, फिर भी वे अर्जुन को — और उसके माध्यम से हम सबको — बताते हैं कि आत्मज्ञान किसी जीवित, तत्त्वदर्शी गुरु के सान्निध्य में ही खुलता है। मुण्डक उपनिषद् भी यही कहता है कि जिज्ञासु हाथ में समिधा लेकर ऐसे गुरु के पास जाए जो शास्त्र का ज्ञाता (श्रोत्रिय) और ब्रह्म में स्थित (ब्रह्मनिष्ठ) हो।

भगवान शिष्य के तीन गुण बताते हैं। पहला है ‘प्रणिपात’ — विनम्रता से झुककर, पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रणाम करना। यह केवल शरीर का झुकना नहीं, अहंकार का झुकना है। जो पहले से भरा हुआ पात्र है, उसमें कुछ नहीं डाला जा सकता; ‘मैं सब जानता हूँ’ का भाव ज्ञान का सबसे बड़ा बाधक है। प्रणिपात शिष्य को ग्रहणशील बनाता है।

दूसरा है ‘परिप्रश्न’ — भली-भाँति प्रश्न करना। आचार्य शंकर बताते हैं कि ये प्रश्न बन्धन क्या है, मोक्ष कैसे होता है, विद्या क्या है, अविद्या क्या है — ऐसे मूल विषयों पर होने चाहिए। ‘परि’ उपसर्ग बताता है कि प्रश्न गहरे और सर्वांगीण हों, पर वे वाद-विवाद या गुरु की परीक्षा लेने के लिए नहीं, सच्ची जिज्ञासा से हों। गीता स्वयं अर्जुन के प्रश्नों से ही आगे बढ़ती है — प्रश्न पूछना श्रद्धा का विरोधी नहीं, उसका पूरक है।

तीसरा है ‘सेवा’ — गुरु की सेवा। सेवा से अहंकार घिसता है, मन विनम्र और शुद्ध होता है, और गुरु तथा शिष्य के बीच हृदय का सम्बन्ध बनता है। प्राचीन गुरुकुलों में शिष्य वर्षों गुरु के साथ रहकर उनके दैनिक कार्यों में सहायता करते थे, और उसी निकटता में शिक्षा केवल शब्दों से नहीं, गुरु के जीवन से भी मिलती थी। ये तीनों मिलकर शिष्य को ज्ञान का अधिकारी बनाते हैं।

अब गुरु के लक्षण — ‘ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ — ज्ञानी और तत्त्वदर्शी। आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि केवल शास्त्र जानना पर्याप्त नहीं; जिसने सत्य का साक्षात् अनुभव किया है, उसी का दिया हुआ ज्ञान फलदायी होता है। केवल पुस्तकीय ज्ञान वाला मार्ग बता सकता है, पर अनुभवी गुरु ही संशय की जड़ काट सकता है। आचार्य रामानुज भी कहते हैं कि शिष्य के विनम्र भाव से प्रसन्न होकर आत्मतत्त्व के ज्ञाता उसे ज्ञान देते हैं। यह परम्परा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है — सच्चा ज्ञान विनम्रता, जिज्ञासा और समर्पण के बिना नहीं मिलता।

प्रसंग

4.33 में भगवान ने ज्ञान-यज्ञ को द्रव्य-यज्ञ से श्रेष्ठ बताया और कहा कि सब कर्म ज्ञान में परिणत होते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि वह ज्ञान तत्त्वदर्शी गुरु के पास प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा द्वारा प्राप्त होता है। अगले श्लोक (4.35) में वे इस ज्ञान का फल बताते हैं — इसे पाकर फिर मोह नहीं होता और सभी प्राणी आत्मा में तथा भगवान में दिखाई देते हैं।

जीवन-शिक्षा

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सच्ची सीख पाने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं — विनम्रता, सच्ची जिज्ञासा और सेवा का भाव। अहंकार छोड़कर किसी अनुभवी मार्गदर्शक के पास जाइए, ईमानदारी से प्रश्न पूछिए, और जो सीखें उसके प्रति कृतज्ञ रहिए।

मुख्य शब्द

प्रणिपात
विनम्रता और समर्पण से किया गया प्रणाम; अहंकार का झुकना
परिप्रश्न
सच्ची जिज्ञासा से पूछे गए गहन, सर्वांगीण प्रश्न
सेवा
गुरु की सेवा, जो मन को विनम्र और शुद्ध बनाती है
तत्त्वदर्शी
जिसने सत्य का साक्षात् अनुभव किया हो

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