श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 39
अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
śraddhāvā.Nllabhate jñānaṃ tatparaḥ saṃyatendriyaḥ .
jñānaṃ labdhvā parāṃ śāntimacireṇādhigacchati ॥
अर्थ
श्रद्धावान्, (ज्ञान-प्राप्ति में) तत्पर और इन्द्रियों को संयम में रखने वाला पुरुष ज्ञान को प्राप्त करता है; और ज्ञान को प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है
शब्दार्थ
- श्रद्धावान् – श्रद्धा से युक्त (गुरु और शास्त्र के वचनों में आस्था रखने वाला)
- लभते – प्राप्त करता है
- ज्ञानम् – ज्ञान को
- तत्परः – उसी (ज्ञान) में लगा हुआ, पूर्ण निष्ठा वाला
- संयतेन्द्रियः – जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं
- लब्ध्वा – प्राप्त करके
- पराम् – परम, सर्वोच्च
- शान्तिम् – शान्ति को
- अचिरेण – शीघ्र ही, बिना विलम्ब के
- अधिगच्छति – प्राप्त हो जाता है
अन्वय
श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियः (पुरुषः) ज्ञानं लभते; ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में भगवान ने कहा कि योग से तैयार साधक समय पाकर ज्ञान को प्राप्त करता है। अब वे उस साधक के तीन निश्चित गुण बताते हैं, जिनके होने पर ज्ञान अवश्य मिलता है — श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय-संयम। यह श्लोक आध्यात्मिक साधक के लिए एक संक्षिप्त किन्तु सम्पूर्ण पाठ्यक्रम जैसा है।
पहला गुण है ‘श्रद्धावान्’ — श्रद्धा से युक्त। श्रद्धा अन्धविश्वास नहीं है; यह गुरु और शास्त्र के वचनों में वह आस्था है जो साधक को तब तक मार्ग पर टिकाए रखती है जब तक वह स्वयं सत्य का अनुभव न कर ले। आचार्य शंकर एक सूक्ष्म बात कहते हैं — 4.34 में बताए गए प्रणिपात और सेवा बाहर से दिखावे के लिए भी किए जा सकते हैं, परन्तु सच्ची श्रद्धा में कोई छल नहीं हो सकता। इसीलिए यहाँ श्रद्धा को सबसे पहले रखा गया है।
परन्तु केवल श्रद्धा पर्याप्त नहीं; इसलिए दूसरा गुण है ‘तत्परः’ — उसी में पूरी तरह लगा हुआ। जो साधक श्रद्धा तो रखता है पर प्रयत्न में शिथिल है, उसे ज्ञान नहीं मिलता। तत्परता का अर्थ है ज्ञान को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बनाकर उसके लिए निरन्तर प्रयत्न करना। तीसरा गुण है ‘संयतेन्द्रियः’ — इन्द्रियों पर संयम। आचार्य शंकर कहते हैं कि श्रद्धा और तत्परता होने पर भी यदि इन्द्रियाँ अनियन्त्रित हों, तो मन विषयों में बिखर जाता है और ज्ञान स्थिर नहीं होता। ये तीनों मिलकर ज्ञान-प्राप्ति को निश्चित बना देते हैं।
फिर फल — ‘ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति’ — ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होता है। आचार्य शंकर के अनुसार यह परम शान्ति मोक्ष ही है, और यह ज्ञान के तुरन्त बाद आती है, जैसे दीपक जलते ही अन्धकार मिट जाता है। ‘पराम्’ शब्द बताता है कि यह संसार की अस्थायी शान्ति नहीं, जो परिस्थितियाँ बदलते ही टूट जाए, बल्कि वह शान्ति है जो किसी बाहरी कारण पर निर्भर नहीं। आचार्य रामानुज भी इसे आत्म-साक्षात्कार से उपजी निर्वाण रूपी शान्ति बताते हैं।
यह श्लोक अगले श्लोक की भूमिका भी बनाता है, जहाँ भगवान ठीक इसके विपरीत व्यक्ति — अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशयग्रस्त — की दशा बताते हैं।
प्रसंग
4.38 में भगवान ने कहा कि ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं, और योग से तैयार साधक उसे समय पाकर स्वयं प्राप्त करता है। यहाँ वे बताते हैं कि श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान पाकर शीघ्र परम शान्ति को प्राप्त होता है। अगले श्लोक (4.40) में वे इसके विपरीत अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशयी पुरुष के विनाश का वर्णन करते हैं।
जीवन-शिक्षा
किसी भी ऊँचे लक्ष्य को पाने के लिए तीन बातें चाहिए — मार्ग में विश्वास, पूरी लगन और आत्म-संयम। इनमें से एक भी कम हो तो यात्रा अधूरी रहती है; तीनों साथ हों तो सफलता और भीतर की शान्ति निश्चित है।
मुख्य शब्द
- श्रद्धा
- गुरु और शास्त्र के वचनों में निष्कपट आस्था
- तत्पर
- लक्ष्य में पूरी तरह लगा हुआ, एकनिष्ठ
- संयतेन्द्रिय
- जिसने इन्द्रियों को वश में किया हो
- परा शान्ति
- परम शान्ति; मोक्ष, जो किसी बाहरी कारण पर निर्भर नहीं
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 4.34 – तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन
- गीता 4.35 – यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं
- गीता 4.36 – अपि चेदसि पापेभ्यः
- गीता 4.37 – यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन
- गीता 4.38 – न हि ज्ञानेन
- गीता 4.40 – अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति
- गीता 4.41 – योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्
- गीता 4.42 – तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः