श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 30
अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
apare niyatāhārāḥ prāṇānprāṇeṣu juhvati .
sarve.apyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ ॥
अर्थ
दूसरे नियमित आहार करने वाले साधक प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ के तत्त्व को जानने वाले हैं और यज्ञ के द्वारा इनके पाप नष्ट हो चुके हैं
शब्दार्थ
- अपरे – दूसरे
- नियताहाराः – नियमित, संयमित आहार करने वाले
- प्राणान् – प्राणों को
- प्राणेषु – प्राणों में
- जुह्वति – हवन करते हैं
- सर्वे – सभी
- अपि – भी
- एते – ये
- यज्ञविदः – यज्ञ को जानने वाले
- यज्ञक्षपितकल्मषाः – जिनके पाप (मल) यज्ञ द्वारा नष्ट हो गए हैं
अन्वय
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । एते सर्वे अपि यज्ञविदः यज्ञक्षपितकल्मषाः (सन्ति) ।
व्याख्या
यज्ञों की सूची का अन्तिम यज्ञ इस श्लोक के पहले भाग में है — ‘अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति’। कुछ साधक आहार को नियमित और सीमित करके प्राणों को प्राणों में अर्पित करते हैं। आचार्य शंकर समझाते हैं कि आहार को संयमित करने से इन्द्रियाँ और प्राण-शक्तियाँ शान्त और क्षीण होती हैं; तब जिस-जिस प्राण को वश में किया जाता है, उसी में अन्य प्राण विलीन हो जाते हैं — यही ‘प्राणों का प्राणों में हवन’ है।
भोजन और मन का सम्बन्ध भारतीय चिन्तन में सदा से माना गया है। उपनिषद् में कहा गया है कि आहार शुद्ध होने पर अन्तःकरण शुद्ध होता है। आगे छठे अध्याय (6.16–17) में भगवान स्वयं कहेंगे कि योग न बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का — युक्त आहार वाले का ही योग दुःखों का नाश करता है। ‘नियताहार’ का अर्थ भूखे रहना नहीं, बल्कि संतुलित, मर्यादित और सात्त्विक भोजन है।
अब श्लोक के दूसरे भाग में भगवान सभी यज्ञों का निष्कर्ष देते हैं — ‘सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः’। 4.25 से यहाँ तक बताए गए सभी साधक ‘यज्ञविद्’ हैं — यज्ञ के तत्त्व को जानने वाले। और इन सबके ‘कल्मष’ — पाप, चित्त के मल — यज्ञ के द्वारा नष्ट हो गए हैं।
यहाँ गीता की उदार दृष्टि स्पष्ट होती है। भगवान किसी एक साधना को ही एकमात्र मार्ग नहीं कहते। देव-पूजा, इन्द्रिय-संयम, दान, तप, स्वाध्याय, प्राणायाम, आहार-संयम — सभी यज्ञ हैं, यदि वे स्वार्थ-रहित भाव से किए जाएँ। सबका साझा फल है चित्त की शुद्धि, और शुद्ध चित्त ही आगे ज्ञान का पात्र बनता है।
प्रसंग
4.29 में भगवान ने प्राणायाम रूपी यज्ञ बताया। यहाँ वे आहार-संयम रूपी यज्ञ का उल्लेख करके 4.25 से चली आ रही यज्ञों की सूची पूरी करते हैं और कहते हैं कि ये सभी साधक यज्ञ द्वारा पाप-रहित हो जाते हैं। अगले श्लोक (4.31) में वे यज्ञ के अवशेष रूपी अमृत का फल और यज्ञ न करने वाले की दुर्दशा बताते हैं।
जीवन-शिक्षा
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, मन को गढ़ने वाला भी है। संतुलित, सात्त्विक और मर्यादित आहार अपनाइए; और याद रखिए कि आपकी साधना जो भी हो, यदि वह निःस्वार्थ भाव से की जाए तो वह आपके मन को अवश्य शुद्ध करेगी।
मुख्य शब्द
- नियताहार
- संतुलित, संयमित और मर्यादित भोजन करने वाला
- यज्ञविद्
- यज्ञ के सच्चे तत्त्व को जानने वाला
- कल्मष
- पाप, चित्त का मल और अशुद्धि
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 4.25 – दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः
- गीता 4.26 – श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति
- गीता 4.27 – सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे
- गीता 4.28 – द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे
- गीता 4.29 – अपाने जुह्वति प्राणं
- गीता 4.31 – यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म
- गीता 4.32 – एवं बहुविधा यज्ञा
- गीता 4.33 – श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप
- गीता 4.34 – तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन
- गीता 4.35 – यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं