भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 31

अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam .
nāyaṃ loko.astyayajñasya kuto.anyaḥ kurusattama ॥

अर्थ

हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ के बाद बचे हुए अमृत-रूपी अन्न का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी सुखदायी नहीं है, फिर परलोक कैसे होगा?

शब्दार्थ

  • यज्ञशिष्टामृतभुजः – यज्ञ से बचे हुए अमृत (रूपी अन्न) को भोगने वाले
  • यान्ति – प्राप्त होते हैं
  • ब्रह्म – ब्रह्म को
  • सनातनम् – सनातन, नित्य
  • न – नहीं
  • अयम् – यह
  • लोकः – लोक, संसार
  • अस्ति – है
  • अयज्ञस्य – यज्ञ न करने वाले का
  • कुतः – कैसे, कहाँ से
  • अन्यः – दूसरा (परलोक)
  • कुरुसत्तम – हे कुरुवंश में श्रेष्ठ (अर्जुन)

अन्वय

(हे) कुरुसत्तम, यज्ञशिष्टामृतभुजः सनातनं ब्रह्म यान्ति । अयज्ञस्य अयं लोकः (अपि) न अस्ति, अन्यः (लोकः) कुतः ?

व्याख्या

पिछले श्लोक में भगवान ने कहा कि सभी यज्ञ करने वालों के पाप नष्ट हो जाते हैं। अब वे यज्ञ के फल का और विस्तार करते हैं। ‘यज्ञशिष्टामृतभुजः’ — जो यज्ञ के बाद बचा हुआ भाग ग्रहण करते हैं, वह उनके लिए अमृत है। यह विचार तीसरे अध्याय (3.13) से जुड़ता है, जहाँ भगवान ने कहा था कि यज्ञ के शेष अन्न को खाने वाले सज्जन सब पापों से मुक्त होते हैं, और जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।

‘यज्ञशिष्ट’ को ‘अमृत’ क्यों कहा? क्योंकि जो भोजन, धन या सुख पहले दूसरों, देवताओं और समाज के प्रति कर्तव्य निभाकर प्राप्त किया जाता है, वह मन को बाँधता नहीं, बल्कि पोषित करता है। आचार्य शंकर बताते हैं कि यज्ञ करके, शास्त्र-विधि के अनुसार बचे अन्न का सेवन करने वाले साधक, चित्त-शुद्धि और ज्ञान के द्वारा, समय पाकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। आचार्य रामानुज भी यहाँ यज्ञ को आत्म-साक्षात्कार का साधन मानते हैं।

इसके विपरीत भगवान दृढ़ता से कहते हैं — ‘नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः’ — जो कोई भी यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं है, तो परलोक कहाँ से होगा? इसका अर्थ है कि पूरी तरह स्वार्थ में डूबा जीवन इस संसार में भी सच्चा सुख और सम्मान नहीं पाता। समाज, परिवार और प्रकृति — सब परस्पर देने-लेने के यज्ञ-चक्र पर टिके हैं; जो केवल लेता है और कुछ नहीं देता, वह इस चक्र से कट जाता है।

अर्जुन को ‘कुरुसत्तम’ — कुरुवंश में श्रेष्ठ — कहकर भगवान उसे उसकी कुल-परम्परा का स्मरण कराते हैं। एक श्रेष्ठ क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध भी यज्ञ ही है, जिसे निःस्वार्थ भाव से करना उसका कर्तव्य है।

प्रसंग

4.30 में भगवान ने यज्ञों की सूची पूरी की और कहा कि सभी यज्ञकर्ता पाप-रहित हो जाते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि यज्ञ-शेष रूपी अमृत भोगने वाले सनातन ब्रह्म को पाते हैं, और यज्ञ-रहित व्यक्ति को न यह लोक मिलता है, न परलोक। अगले श्लोक (4.32) में वे कहते हैं कि ये सब यज्ञ वेदों में वर्णित हैं और कर्म से उत्पन्न होते हैं।

जीवन-शिक्षा

पहले देना, फिर लेना — यही जीवन का यज्ञ-सिद्धान्त है। अपनी कमाई और अपने समय का एक अंश परिवार, समाज और ईश्वर के लिए अर्पित कीजिए; तब जो बचेगा, वह आपके लिए प्रसाद और अमृत बन जाएगा।

मुख्य शब्द

यज्ञशिष्ट
यज्ञ के बाद बचा हुआ भाग, प्रसाद
अमृत
जीवन देने वाला, पवित्र करने वाला; यहाँ यज्ञ-शेष
अयज्ञ
जो कोई यज्ञ या निःस्वार्थ कर्म नहीं करता
सनातन ब्रह्म
नित्य, शाश्वत परम सत्य

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