श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 19
अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yasya sarve samārambhāḥ kāmasaṅkalpavarjitāḥ .
jñānāgnidagdhakarmāṇaṃ tamāhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥ ॥
अर्थ
जिसके सभी कार्य कामना और संकल्प से रहित होते हैं, जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूपी अग्नि में भस्म हो गए हैं, उस पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं
शब्दार्थ
- यस्य – जिसके
- सर्वे – सभी
- समारम्भाः – कार्यारम्भ, उद्यम, कर्म
- कामसङ्कल्पवर्जिताः – कामना और संकल्प से रहित
- ज्ञानाग्नि – ज्ञानरूपी अग्नि
- दग्धकर्माणम् – जिसके कर्म जल गए हैं, उसको
- तम् – उसको
- आहुः – कहते हैं
- पण्डितम् – पण्डित, सच्चा ज्ञानी
- बुधाः – ज्ञानीजन, बुद्धिमान लोग
अन्वय
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः, तं ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं बुधाः पण्डितम् आहुः ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में भगवान ने कर्म में अकर्म देखने वाले को ‘बुद्धिमान’ कहा था। अब वे ऐसे व्यक्ति के लक्षण विस्तार से बताने लगते हैं, और यह वर्णन 4.23 तक चलता है। पहला लक्षण है — ‘यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः’ — जिसके सभी कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं।
‘काम’ अर्थात् फल की इच्छा, और ‘संकल्प’ अर्थात् ‘मैं यह करूँगा, इससे मुझे यह मिलेगा’ — इस प्रकार की मानसिक योजना, जो अहंकार से जुड़ी होती है। आचार्य शंकर बताते हैं कि संकल्प ही कामना का बीज है; पहले मन किसी वस्तु के बारे में सोचता है, फिर उसकी इच्छा जागती है। ऐसा ज्ञानी व्यक्ति कर्म करता है — वह निष्क्रिय नहीं है — परन्तु उसके कर्म केवल लोकसंग्रह के लिए या शरीर-निर्वाह के लिए होते हैं, किसी व्यक्तिगत लालसा के लिए नहीं।
‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’ — जिसके कर्म ज्ञान की अग्नि में जल गए हैं। यह अद्भुत रूपक है। जैसे अग्नि बीज को भून दे तो वह अंकुरित नहीं होता, वैसे ही आत्मज्ञान कर्मों की बन्धनकारी शक्ति को नष्ट कर देता है। ज्ञानी के कर्म बाहर से दिखते तो हैं, पर उनमें फल देकर बाँधने की शक्ति नहीं रहती। यही बात आगे 4.37 में और स्पष्ट रूप से कही गई है।
ऐसे व्यक्ति को ‘बुधाः’ — ज्ञानीजन — ‘पण्डित’ कहते हैं। यहाँ पण्डित का अर्थ केवल शास्त्र पढ़ा हुआ व्यक्ति नहीं, बल्कि वह है जिसकी बुद्धि आत्मतत्त्व में स्थिर हो। सच्चा पाण्डित्य शब्दों का भण्डार नहीं, बल्कि कामना-रहित, ज्ञान-प्रकाशित जीवन है।
प्रसंग
4.18 में भगवान ने कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने वाले को बुद्धिमान कहा। यहाँ से वे ऐसे ज्ञानी के लक्षण बताते हैं — उसके कर्म कामना-संकल्प से रहित और ज्ञानाग्नि से दग्ध होते हैं। अगले श्लोक (4.20) में वे बताते हैं कि फलासक्ति त्यागने वाला कर्म करते हुए भी कुछ नहीं करता।
जीवन-शिक्षा
हर काम में ‘मुझे इससे क्या मिलेगा’ की गणना मन को बाँधती है। जब हम काम को कर्तव्य और सेवा के भाव से करते हैं, तब वही काम हमें थकाता नहीं, बल्कि भीतर से हल्का और प्रकाशित करता है।
मुख्य शब्द
- समारम्भ
- कार्यों का आरम्भ, उद्यम
- कामसंकल्प
- फल की इच्छा और उसकी मानसिक योजना
- ज्ञानाग्नि
- ज्ञानरूपी अग्नि, जो कर्मबन्धन को जला देती है
- पण्डित
- जिसकी बुद्धि आत्मतत्त्व में स्थिर हो, सच्चा ज्ञानी
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 4.14 – न मां कर्माणि
- गीता 4.15 – एवं ज्ञात्वा कृतं
- गीता 4.16 – किं कर्म किमकर्मेति
- गीता 4.17 – कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं
- गीता 4.18 – कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि
- गीता 4.20 – त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो
- गीता 4.21 – निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः
- गीता 4.22 – यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः
- गीता 4.23 – गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः
- गीता 4.24 – ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ