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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 23

अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ .
yajñāyācarataḥ karma samagraṃ pravilīyate ॥

अर्थ

जिसकी आसक्ति मिट गई है, जो (राग-द्वेष आदि बन्धनों से) मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ के लिए कर्म करता है — ऐसे पुरुष का सम्पूर्ण कर्म (अपने फल सहित) पूरी तरह विलीन हो जाता है

शब्दार्थ

  • गतसङ्गस्य – जिसकी आसक्ति चली गई है, उसका
  • मुक्तस्य – (धर्म-अधर्म, राग-द्वेष आदि बन्धनों से) मुक्त हुए का
  • ज्ञानावस्थितचेतसः – जिसका चित्त ज्ञान में स्थिर है, उसका
  • यज्ञाय – यज्ञ के लिए, भगवान की प्रसन्नता के लिए
  • आचरतः – आचरण (कर्म) करने वाले का
  • कर्म – कर्म
  • समग्रम् – सम्पूर्ण, फल सहित
  • प्रविलीयते – पूरी तरह विलीन हो जाता है, नष्ट हो जाता है

अन्वय

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः यज्ञाय आचरतः (पुरुषस्य) समग्रं कर्म प्रविलीयते ।

व्याख्या

यह श्लोक 4.19 से चल रहे ज्ञानी के लक्षणों का उपसंहार है। यहाँ भगवान चार विशेषण देकर उस पुरुष का पूरा चित्र खींचते हैं और फिर परिणाम बताते हैं — उसका सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाता है। ‘गतसङ्ग’ — जिसकी आसक्ति चली गई; ‘मुक्त’ — जो बन्धनों से छूट गया; ‘ज्ञानावस्थितचेता’ — जिसका मन ज्ञान में दृढ़ता से टिका है; और ‘यज्ञायाचरत’ — जो केवल यज्ञ के लिए कर्म करता है।

यहाँ ‘यज्ञ’ शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यही अगले कई श्लोकों का विषय बनने वाला है। तीसरे अध्याय (3.9) में भगवान कह चुके हैं कि यज्ञ के लिए किए गए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म बन्धन का कारण होते हैं। आचार्य शंकर यहाँ ‘यज्ञ’ का अर्थ यज्ञ-स्वरूप भगवान विष्णु भी बताते हैं — अर्थात् जो कर्म ईश्वर की प्रसन्नता के लिए, अपने लिए नहीं, किया जाए। आचार्य रामानुज इसका अर्थ करते हैं कि ऐसा पुरुष यज्ञ आदि कर्म आत्मज्ञान की ओर बढ़ने के साधन के रूप में करता है।

‘समग्रं प्रविलीयते’ — सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाता है। ‘प्र’ उपसर्ग बताता है कि यह विलय पूर्ण है — कर्म का कोई अंश, कोई संस्कार ऐसा नहीं बचता जो आगे फल देकर बाँध सके। जैसे पानी में घुली हुई नमक की डली दिखाई नहीं देती, वैसे ही ज्ञानी के कर्म बाहर होते हुए भी अपना बन्धनकारी रूप खो देते हैं।

इस प्रकार 4.18 में जिसे ‘कर्म में अकर्म’ कहा गया था, उसकी व्याख्या यहाँ पूरी होती है। अब प्रश्न उठता है — यज्ञ-भाव से किया गया कर्म बन्धन क्यों नहीं बनता? इसका उत्तर अगला प्रसिद्ध श्लोक ‘ब्रह्मार्पणम्’ देता है, जिसमें ज्ञानी की वह दृष्टि बताई गई है जिससे कर्म का हर अंग ब्रह्म दिखने लगता है।

प्रसंग

4.22 में भगवान ने संतुष्ट, द्वन्द्वातीत और समभाव वाले पुरुष को कर्म करके भी न बँधने वाला बताया। यह श्लोक 4.19 से चल रहे वर्णन का निष्कर्ष है — यज्ञ के लिए कर्म करने वाले मुक्त पुरुष के कर्म पूरी तरह विलीन हो जाते हैं। अगले श्लोक (4.24) में भगवान बताते हैं कि ऐसा ज्ञानी यज्ञ के हर अंग में ब्रह्म को ही देखता है।

जीवन-शिक्षा

जो काम केवल अपने स्वार्थ के लिए किया जाता है, वह मन पर बोझ और संस्कार छोड़ जाता है; जो काम ईश्वर और समाज की सेवा मानकर किया जाता है, वह मन को हल्का करता है। अपने रोज़ के कामों को भी ‘यज्ञ’ बनाइए — उन्हें अर्पण के भाव से कीजिए।

मुख्य शब्द

गतसङ्ग
जिसकी आसक्ति समाप्त हो गई हो
ज्ञानावस्थितचेता
जिसका चित्त आत्मज्ञान में स्थिर हो
यज्ञ
ईश्वर-अर्पण और लोकहित के भाव से किया गया कर्म
प्रविलय
पूर्ण विलय; कर्म की बन्धनकारी शक्ति का पूरा नाश

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