श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 16
अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
kiṃ karma kimakarmeti kavayo.apyatra mohitāḥ .
tatte karma pravakṣyāmi yajjñātvā mokṣyase.aśubhāt ॥
अर्थ
कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें कर्म का वह तत्त्व बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे
शब्दार्थ
- किम् – क्या
- कर्म – कर्म
- किम् – क्या
- अकर्म – अकर्म, कर्म का अभाव
- इति – इस विषय में
- कवयः – बुद्धिमान, विद्वान, कवि
- अपि – भी
- अत्र – यहाँ, इस विषय में
- मोहिताः – मोहित, भ्रमित
- तत् – वह
- ते – तुम्हें
- कर्म – कर्म (का तत्त्व)
- प्रवक्ष्यामि – भली-भाँति कहूँगा
- यत् – जिसे
- ज्ञात्वा – जानकर
- मोक्ष्यसे – मुक्त हो जाओगे
- अशुभात् – अशुभ से, संसार-बन्धन से
अन्वय
किं कर्म किम् अकर्म इति अत्र कवयः अपि मोहिताः । (अतः) तत् कर्म ते प्रवक्ष्यामि यत् ज्ञात्वा (त्वम्) अशुभात् मोक्ष्यसे ।
व्याख्या
इस श्लोक से अध्याय का एक नया और गहरा प्रसंग आरम्भ होता है — कर्म और अकर्म का विवेक। भगवान ने अभी कहा था ‘कर्म करो’, परन्तु तुरन्त यह भी जोड़ते हैं कि कर्म का वास्तविक स्वरूप समझना सरल नहीं है। ‘किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः’ — कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं।
साधारण दृष्टि से यह प्रश्न सरल लगता है — शरीर से कुछ करना कर्म है, और कुछ न करना अकर्म। परन्तु आचार्य शंकर बताते हैं कि यही साधारण धारणा भ्रम का कारण है। कोई व्यक्ति शान्त बैठा हो, पर मन में ‘मैं विश्राम कर रहा हूँ’ का अहंकार हो, तो वह भी कर्म ही है; और कोई ज्ञानी सक्रिय रहते हुए भी आत्मा को निष्क्रिय जानता हो, तो उसका कर्म भी अकर्म है। बाहरी क्रिया से कर्म और अकर्म का निर्णय नहीं होता।
अर्जुन के लिए यह प्रश्न व्यक्तिगत है। वह सोचता था कि युद्ध छोड़ देना ‘अकर्म’ है, इसलिए पाप-रहित है, और युद्ध करना ‘कर्म’ है, इसलिए पापमय। भगवान यहाँ संकेत देते हैं कि यह सोच ही मोह है। कर्तव्य से भागना भी एक कर्म है, और प्रायः बन्धनकारी कर्म।
‘यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’ — जिसे जानकर तुम अशुभ से छूट जाओगे। ‘अशुभ’ से अभिप्राय है संसार-चक्र, जन्म-मृत्यु का बन्धन। भगवान का वचन स्पष्ट है कि कर्म के सही ज्ञान से ही मुक्ति मिलती है, कर्म के त्याग से नहीं। अगले श्लोकों में वे इसी गहन रहस्य को खोलेंगे।
प्रसंग
4.15 में भगवान ने अर्जुन को प्राचीन मुमुक्षुओं की तरह कर्म करने को कहा। यहाँ वे बताते हैं कि कर्म और अकर्म का सही ज्ञान कठिन है, और वे इसे समझाने का वचन देते हैं। अगले श्लोक (4.17) में वे कहते हैं कि कर्म, विकर्म और अकर्म — तीनों को जानना आवश्यक है।
जीवन-शिक्षा
बाहर से निष्क्रिय दिखना ही शान्ति या धर्म नहीं है, और सक्रिय रहना ही बन्धन नहीं है। हर कर्म के पीछे के भाव और ज्ञान को समझना ही सही निर्णय की कुंजी है।
मुख्य शब्द
- कर्म
- क्रिया; विशेषतः शास्त्रविहित कर्तव्य
- अकर्म
- कर्म का अभाव; वह अवस्था जहाँ कर्म बन्धनकारी न रहे
- कवि
- क्रान्तदर्शी विद्वान, बुद्धिमान
- अशुभ
- अमंगल; यहाँ संसार-बन्धन
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 4.11 – ये यथा मां
- गीता 4.12 – काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं
- गीता 4.13 – चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं
- गीता 4.14 – न मां कर्माणि
- गीता 4.15 – एवं ज्ञात्वा कृतं
- गीता 4.17 – कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं
- गीता 4.18 – कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि
- गीता 4.19 – यस्य सर्वे समारम्भाः
- गीता 4.20 – त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो
- गीता 4.21 – निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः