श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 17
अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
karmaṇo hyapi boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ .
akarmaṇaśca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ ॥
अर्थ
कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, विकर्म (निषिद्ध कर्म) का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति अत्यन्त गहन है
शब्दार्थ
- कर्मणः – कर्म का (स्वरूप)
- हि – निश्चय ही
- अपि – भी
- बोद्धव्यम् – जानना चाहिए, समझने योग्य है
- बोद्धव्यम् – जानना चाहिए
- च – और
- विकर्मणः – विकर्म (निषिद्ध या विपरीत कर्म) का
- अकर्मणः – अकर्म का
- च – और
- बोद्धव्यम् – जानना चाहिए
- गहना – गहन, दुर्बोध
- कर्मणः – कर्म की
- गतिः – गति, स्वरूप, मार्ग
अन्वय
कर्मणः हि अपि बोद्धव्यम्, विकर्मणः च बोद्धव्यम्, अकर्मणः च बोद्धव्यम्; (यतः) कर्मणः गतिः गहना ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में भगवान ने कहा था कि कर्म-अकर्म के विषय में ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं। अब वे बताते हैं कि इस विषय को समझने के लिए तीन बातों का ज्ञान आवश्यक है — कर्म, विकर्म और अकर्म। तीन बार ‘बोद्धव्यम्’ (जानना चाहिए) कहकर भगवान इस ज्ञान की अनिवार्यता पर बल देते हैं।
‘कर्म’ — यहाँ कर्म का अर्थ है शास्त्र द्वारा विहित, कर्तव्य रूप में करने योग्य कर्म। ‘विकर्म’ — आचार्य शंकर और रामानुज दोनों इसे शास्त्र-निषिद्ध कर्म मानते हैं, अर्थात् वे कर्म जो धर्म के विरुद्ध हैं और पतन की ओर ले जाते हैं। कुछ टीकाकार ‘विकर्म’ को ‘विशेष कर्म’ — ज्ञान से युक्त विशिष्ट कर्म — के रूप में भी देखते हैं, परन्तु मुख्य परम्परागत अर्थ निषिद्ध कर्म ही है।
‘अकर्म’ — कर्म का अभाव, या वह स्थिति जहाँ कर्म करते हुए भी बन्धन न हो। आचार्य रामानुज यहाँ अकर्म का अर्थ आत्मज्ञान करते हैं — कर्म करते समय आत्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान। आचार्य शंकर के अनुसार अकर्म का अर्थ है निष्क्रियता, जिसका सही ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि केवल हाथ रोक लेने से कोई अकर्मी नहीं हो जाता।
‘गहना कर्मणो गतिः’ — कर्म की गति गहन है। यह वाक्य भारतीय दर्शन में बहुत प्रसिद्ध है। कौन-सा कर्म बाँधता है, कौन-सा मुक्त करता है; कौन-सा कर्म दिखने में अच्छा पर भीतर से स्वार्थी है; और कौन-सा कठोर दिखने पर भी धर्म है — यह निर्णय अत्यन्त सूक्ष्म है। कर्म का फल केवल बाहरी क्रिया पर नहीं, उसके पीछे के भाव, ज्ञान और उद्देश्य पर निर्भर करता है। इसीलिए अगले श्लोक में भगवान इस गहनता को एक अद्भुत सूत्र में खोलते हैं।
प्रसंग
4.16 में भगवान ने कहा कि कर्म-अकर्म के विषय में ज्ञानी भी मोहित हो जाते हैं। यहाँ वे कर्म, विकर्म और अकर्म — तीनों को जानने की आवश्यकता बताते हैं। अगले श्लोक (4.18) में वे कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने का प्रसिद्ध सूत्र देते हैं।
जीवन-शिक्षा
किसी कर्म को केवल ऊपर से देखकर अच्छा या बुरा न ठहराएँ; उसके पीछे का भाव और उद्देश्य भी देखें। जीवन में सही-गलत का विवेक धीरे-धीरे, ध्यानपूर्वक चिन्तन और अच्छे मार्गदर्शन से ही विकसित होता है।
मुख्य शब्द
- कर्म
- शास्त्रविहित, कर्तव्य रूप कर्म
- विकर्म
- शास्त्रनिषिद्ध, धर्मविरुद्ध कर्म
- अकर्म
- कर्म का अभाव या बन्धनरहित कर्म की अवस्था
- गहना गति
- कर्म का अत्यन्त सूक्ष्म और दुर्बोध स्वरूप
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 4.12 – काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं
- गीता 4.13 – चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं
- गीता 4.14 – न मां कर्माणि
- गीता 4.15 – एवं ज्ञात्वा कृतं
- गीता 4.16 – किं कर्म किमकर्मेति
- गीता 4.18 – कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि
- गीता 4.19 – यस्य सर्वे समारम्भाः
- गीता 4.20 – त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो
- गीता 4.21 – निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः
- गीता 4.22 – यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः