श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 40
अध्याय 3 – कर्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate .
etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam ॥
अर्थ
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस (काम) के निवास-स्थान कहे गए हैं। यह इन्हीं के द्वारा ज्ञान को ढककर देहधारी जीव को मोहित करता है
शब्दार्थ
- इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ
- मनः – मन
- बुद्धिः – बुद्धि
- अस्य – इसका (काम का)
- अधिष्ठानम् – निवास-स्थान
- उच्यते – कहा जाता है
- एतैः – इनके द्वारा
- एषः – यह
- ज्ञानम् – ज्ञान को
- आवृत्य – ढककर
- देहिनम् – देहधारी (जीव) को
- विमोहयति – मोहित करता है
अन्वय
इन्द्रियाणि, मनः, बुद्धिः अस्य अधिष्ठानम् उच्यते; एषः एतैः ज्ञानम् आवृत्य देहिनं विमोहयति ।
व्याख्या
शत्रु को जीतने के लिए उसका ठिकाना जानना आवश्यक है। भगवान यहाँ काम के तीन अड्डे बताते हैं: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। यही वे किले हैं जहाँ बैठकर यह शत्रु जीव पर शासन करता है। इन्द्रियाँ वह द्वार हैं जहाँ से विषयों का आकर्षण भीतर आता है; मन उन्हें बार-बार सोचकर इच्छा में बदल देता है; और बुद्धि, जो विवेक करने वाली है, भी जब काम के प्रभाव में आती है तो गलत को सही ठहराने लगती है।
यह विश्लेषण अत्यन्त मनोवैज्ञानिक है। सबसे पहले इन्द्रियाँ बाहर के विषयों से आकर्षित होती हैं, फिर मन उनका स्मरण कर चिन्तन करता है, फिर बुद्धि उन्हें पाने के तर्क खोजती है। इस प्रकार शत्रु धीरे-धीरे हमारी सबसे ऊँची क्षमता, अर्थात् विवेक, तक पहुँच जाता है। शंकराचार्य के अनुसार इन तीनों के आश्रय में काम अपने प्रभाव से जीव को मोहित करता है।
रामानुज इस बात पर बल देते हैं कि जब इन तीनों पर कामना हावी होती है तो आत्मा का स्वरूप-ज्ञान ढक जाता है और देहधारी देह को ही आत्मा मान बैठता है। इसीलिए अगले श्लोकों में भगवान इसी क्रम को पलटने का उपाय बताते हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि आत्म-नियन्त्रण केवल इन्द्रियों को रोकने का नाम नहीं; मन और बुद्धि की सफाई भी उतनी ही आवश्यक है।
प्रसंग
3.39 में काम को नित्य शत्रु कहा गया। 3.40 उसके रहने के तीन स्थान बताता है। 3.41 में इन्द्रियों को वश में करके इसे मारने का आदेश आता है।
जीवन-शिक्षा
केवल बाहरी आदतें नहीं, अपने सोचने के ढंग और तर्कों की भी निगरानी कीजिए। कभी-कभी हमारी बुद्धि ही हमारी इच्छाओं की वकील बन जाती है।
मुख्य शब्द
- अधिष्ठान
- निवास या आधार-स्थान
- देही
- देहधारी जीवात्मा
- विमोहन
- भ्रम में डालना
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 3.35 – श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
- गीता 3.36 – अर्जुन उवाच
- गीता 3.37 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 3.38 – धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन
- गीता 3.39 – आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो
- गीता 3.41 – तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ
- गीता 3.42 – इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं
- गीता 3.43 – एवं बुद्धेः परं