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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 31

अध्याय 3 – कर्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ .
śraddhāvanto.anasūyanto mucyante te.api karmabhiḥ ॥

अर्थ

जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त और दोष-दृष्टि से रहित होकर मेरे इस मत का नित्य आचरण करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं

शब्दार्थ

  • ये – जो
  • मानवाः – मनुष्य
  • मे – मेरे
  • इदम् – इस
  • मतम् – मत, उपदेश को
  • नित्यम् – सदा
  • अनुतिष्ठन्ति – आचरण करते हैं
  • श्रद्धावन्तः – श्रद्धा-युक्त
  • अनसूयन्तः – दोष-दृष्टि न रखने वाले
  • मुच्यन्ते – मुक्त हो जाते हैं
  • ते – वे
  • अपि – भी
  • कर्मभिः – कर्मों (के बन्धन) से

अन्वय

ये मानवाः श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः (च सन्तः) मे इदं मतं नित्यम् अनुतिष्ठन्ति, ते अपि कर्मभिः मुच्यन्ते ।

व्याख्या

भगवान अब उपदेश का फल बताते हैं। कर्म को ईश्वर-अर्पण करने का जो मार्ग उन्होंने बताया, उसे अपनाने वाले ‘कर्मभिः मुच्यन्ते’ — कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। पर इस मार्ग पर चलने के लिए दो गुण चाहिए: ‘श्रद्धा’ और ‘अनसूया’।

श्रद्धा का अर्थ अन्धविश्वास नहीं, बल्कि वह आन्तरिक भरोसा है जो साधना की दिशा में बढ़ाता है। जब तक अनुभव पूरा नहीं होता, मार्ग पर चलने के लिए यह भरोसा ही सहारा है। ‘अनसूया’ का अर्थ है दोष खोजने की प्रवृत्ति का अभाव। कई बार हम किसी उपदेश या महापुरुष में कमी देखकर उसे ठुकरा देते हैं और स्वयं को लाभ से वंचित कर लेते हैं।

शंकराचार्य के अनुसार जो श्रद्धा और अनसूया के साथ भगवान के उपदेश का नित्य पालन करते हैं, वे कर्म-बन्धन से छूट जाते हैं, भले ही वे पूर्ण ज्ञानी न हों। ‘अपि’ शब्द यह भी संकेत देता है कि जो ज्ञानी हैं वे तो मुक्त हैं ही, पर इस मत का श्रद्धा से पालन करने वाले भी मुक्त होते हैं। रामानुज इसे भक्ति-भाव से कर्म करने वाले साधक की मुक्ति मानते हैं।

इसका सन्देश यह है कि मार्ग पर चलने के लिए पूर्ण पांडित्य नहीं, श्रद्धा और विनम्रता चाहिए।

प्रसंग

3.30 में कर्म-अर्पण का उपदेश देकर भगवान उसका फल बताते हैं। अगला श्लोक 3.32 उन लोगों का परिणाम कहता है जो इस मत की उपेक्षा करते हैं।

जीवन-शिक्षा

श्रद्धा और दोष-दृष्टि का अभाव सीखने की पहली शर्त हैं। जिनसे हम सीखना चाहते हैं, उनमें त्रुटि खोजने के बजाय सार को ग्रहण करना सीखें।

मुख्य शब्द

श्रद्धा
विश्वास, आस्तिक भाव जिसके साथ साधना की जाती है
अनसूया
दोषारोपण न करना, ईर्ष्या-रहित भाव
मत
उपदेश, सिद्धान्त

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