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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 29

अध्याय 3 – कर्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

prakṛterguṇasammūḍhāḥ sajjante guṇakarmasu .
tānakṛtsnavido mandānkṛtsnavinna vicālayet ॥

अर्थ

प्रकृति के गुणों से मोहित लोग गुणों के कर्मों में आसक्त होते हैं; सम्पूर्ण को जानने वाला पुरुष उन अधूरे ज्ञानवाले मन्द लोगों को विचलित न करे

शब्दार्थ

  • प्रकृतेः – प्रकृति के
  • गुणसम्मूढाः – गुणों से मोहित
  • सज्जन्ते – आसक्त होते हैं
  • गुणकर्मसु – गुणों के कर्मों में
  • तान् – उन
  • अकृत्स्नविदः – अधूरा जानने वाले
  • मन्दान् – मन्द बुद्धि वालों को
  • कृत्स्नवित् – पूर्ण जानने वाला
  • न विचालयेत् – विचलित न करे

अन्वय

प्रकृतेः गुणसम्मूढाः गुणकर्मसु सज्जन्ते; कृत्स्नवित् अकृत्स्नविदः मन्दान् तान् न विचालयेत् ।

व्याख्या

यह श्लोक 3.26 की बात को दोहराकर और गहरा करता है। जो लोग प्रकृति के गुणों से मोहित हैं, वे गुणों के कर्मों को ही अपना जीवन मान लेते हैं और उनमें आसक्त होते हैं। उनके पास सत्य की पूरी समझ नहीं है — वे ‘अकृत्स्नविद्’ हैं, अर्थात् अधूरा जानने वाले। ‘मन्द’ शब्द यहाँ निन्दा के लिए नहीं, बल्कि समझ की सीमा के संकेत के लिए है।

जो ‘कृत्स्नवित्’ है, अर्थात् जिसने सम्पूर्ण को जान लिया है, उसे चाहिए कि वह उन्हें डराकर या खींचकर उनके वर्तमान मार्ग से न हटाए। शंकराचार्य के अनुसार जो आत्मा के अकर्तृत्व को पूर्ण रूप से जानता है, उसे अधूरे जानने वालों के कर्मों का खण्डन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे वे कर्म छोड़ देंगे और ज्ञान भी नहीं पा सकेंगे। रामानुज इसमें श्रेष्ठ का दायित्व देखते हैं कि वह दूसरों को उनके स्तर के अनुसार आगे बढ़ाए।

यह सहनशीलता और दया की शिक्षा है। हर व्यक्ति अपनी यात्रा पर है; किसी को उसकी वर्तमान सीढ़ी से बलपूर्वक उतारना सहायता नहीं है।

अर्जुन के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण है: ज्ञान के नाम पर वह दूसरों को कर्तव्य से विमुख करने वाला उदाहरण न बने।

प्रसंग

3.27–3.28 में कर्तृत्व और ज्ञानी की दृष्टि बताने के बाद 3.29 उसी बात का सामाजिक पक्ष दोहराता है। अब 3.30 में भगवान कर्म को समर्पित करने का उपदेश देकर पूरे खण्ड का सार देते हैं।

जीवन-शिक्षा

जो कम जानते हैं, उनका उपहास या अनादर न करें। अपने आचरण और धैर्य से मार्गदर्शन दीजिए, क्योंकि समझ धीरे-धीरे ही विकसित होती है।

मुख्य शब्द

अकृत्स्नविद्
अधूरा जानने वाला
कृत्स्नवित्
सम्पूर्ण को जानने वाला
गुणसम्मूढ
गुणों के प्रभाव से मोहित

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