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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 22

अध्याय 3 – कर्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiñcana .
nānavāptamavāptavyaṃ varta eva ca karmaṇi ॥

अर्थ

हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरा कोई कर्तव्य नहीं है, और कोई अप्राप्त वस्तु प्राप्त करने योग्य भी नहीं है; फिर भी मैं कर्म में ही लगा रहता हूँ

शब्दार्थ

  • न – नहीं
  • मे – मेरा
  • पार्थ – हे पार्थ
  • अस्ति – है
  • कर्तव्यम् – करने योग्य कार्य
  • त्रिषु लोकेषु – तीनों लोकों में
  • किञ्चन – कुछ भी
  • न अनवाप्तम् – न अप्राप्त
  • अवाप्तव्यम् – प्राप्त करने योग्य
  • वर्ते – लगा रहता हूँ
  • एव च – फिर भी
  • कर्मणि – कर्म में

अन्वय

पार्थ, त्रिषु लोकेषु मे किञ्चन कर्तव्यं न अस्ति, अवाप्तव्यम् अनवाप्तं न (अस्ति); (तथापि) कर्मणि वर्ते एव च ।

व्याख्या

अब भगवान स्वयं को उदाहरण बनाते हैं। वे सर्वशक्तिमान, पूर्णकाम और सृष्टि के स्वामी हैं। तीनों लोकों में उनके लिए न कोई कर्तव्य है, न कोई पाने योग्य वस्तु जो उनके पास पहले से न हो। फिर भी वे कर्म में प्रवृत्त हैं — सृष्टि का पालन, धर्म की रक्षा, भक्तों पर कृपा।

इस कथन का भाव गहरा है। यदि कोई प्राप्ति की इच्छा के बिना भी कर्म कर सकता है, तो कर्म का आधार अभाव नहीं, पूर्णता भी हो सकती है। ईश्वर का कर्म लीला है, उसमें कोई विवशता या लालच नहीं। शंकराचार्य के अनुसार भगवान का यह उदाहरण यह सिद्ध करता है कि कर्म करना अज्ञान का लक्षण नहीं, और जो आत्मतृप्त है वह भी लोकहित के लिए कर्म कर सकता है।

रामानुज कहते हैं कि ईश्वर के अवतार-कर्म भक्तों के संरक्षण के लिए हैं, किसी स्वार्थ के लिए नहीं। इस प्रकार वे अर्जुन को दिखाते हैं कि कर्म और पूर्णता विरोधी नहीं।

जो अर्जुन यह सोच रहा था कि जब कोई चाह नहीं बची तो कर्म किसलिए, उसे यहाँ उत्तर मिलता है: कर्म का कारण केवल चाह नहीं, कर्तव्य, करुणा और लोकहित भी हो सकते हैं।

प्रसंग

3.21 में लोक के अनुकरण की बात कहकर भगवान स्वयं को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। 3.23–3.24 में वे बताते हैं कि यदि वे कर्म न करें तो संसार को क्या हानि होगी।

जीवन-शिक्षा

कर्म का आधार कमी नहीं, भरपूरता भी हो सकती है। जब हम पाने के लिए नहीं, देने और सँभालने के भाव से काम करते हैं, तब कर्म आनन्द बन जाता है।

मुख्य शब्द

कर्तव्य
करने योग्य कर्म
अवाप्तव्य
प्राप्त करने योग्य
त्रिलोक
भू, भुवः, स्वः — तीनों लोक

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