श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 18
अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
satkāramānapūjārthaṃ tapo dambhena caiva yat .
kriyate tadiha proktaṃ rājasaṃ calamadhruvam ॥
अर्थ
जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए तथा दम्भ (दिखावे) से किया जाता है, वह यहाँ चंचल (अस्थिर) और अनिश्चित फल वाला राजसिक तप कहा गया है
शब्दार्थ
- सत्कार – सत्कार, आदरपूर्ण स्वागत
- मान – सम्मान, प्रतिष्ठा
- पूजा – पूजा, लोगों द्वारा पूजा जाना
- अर्थम् – के लिए
- तपः – तप
- दम्भेन – दम्भ से, दिखावे से
- च एव – और भी
- यत् – जो
- क्रियते – किया जाता है
- तत् – वह
- इह – यहाँ
- प्रोक्तम् – कहा गया है
- राजसम् – राजसिक
- चलम् – चंचल, अस्थिर
- अध्रुवम् – अनिश्चित, क्षणिक
अन्वय
यत् तपः सत्कारमानपूजार्थं दम्भेन च एव क्रियते, तत् इह चलम् अध्रुवं राजसं प्रोक्तम् ।
व्याख्या
अब भगवान् राजसिक तप का वर्णन करते हैं। इसकी प्रेरणा है — ‘सत्कारमानपूजार्थम्’ — सत्कार, मान और पूजा पाने की इच्छा। आचार्य शंकर इन तीनों को अलग-अलग समझाते हैं: ‘सत्कार’ — लोग कहें कि ‘यह कितना बड़ा तपस्वी है’; ‘मान’ — लोग खड़े होकर स्वागत करें, प्रणाम करें; ‘पूजा’ — लोग पैर धोएँ, भेंट चढ़ाएँ, आराधना करें। ऐसा तपस्वी अपनी साधना से भगवान् को नहीं, समाज को प्रसन्न करना चाहता है।
‘दम्भेन चैव’ — दम्भ से, अर्थात् दिखावे के लिए। ऐसा तप लोगों के सामने तो बड़ी धूमधाम से होता है, पर एकान्त में उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता। उसका मूल्य दर्शकों की उपस्थिति पर निर्भर है।
भगवान् इस तप के दो गुण बताते हैं — ‘चलम्’ और ‘अध्रुवम्’। ‘चल’ अर्थात् चंचल — ऐसा तप स्थिर नहीं रहता; जब तक प्रशंसा मिलती है तब तक चलता है, और प्रशंसा बन्द होते ही छूट जाता है। ‘अध्रुव’ अर्थात् अनिश्चित — इसका फल भी स्थायी नहीं होता। जो मान-सम्मान मिलता भी है, वह क्षणिक है, और आत्मशुद्धि तो होती ही नहीं।
यह श्लोक आध्यात्मिक जीवन में एक सूक्ष्म खतरे की ओर संकेत करता है। साधक जब कुछ प्रगति करता है, तो उसे लोगों से सम्मान मिलने लगता है। यदि वह उस सम्मान में रस लेने लगे, तो उसकी साधना धीरे-धीरे राजसिक बन जाती है। इसलिए सच्चे साधक अपनी साधना को गुप्त रखना पसन्द करते हैं।
प्रसंग
पिछले श्लोक में सात्त्विक तप का वर्णन हुआ; यहाँ राजसिक तप का। अगले श्लोक में तामसिक तप बताया गया है।
जीवन-शिक्षा
जो साधना प्रशंसा पाने के लिए की जाती है, वह प्रशंसा रुकते ही रुक जाती है। अपनी साधना को यथासम्भव गुप्त और सरल रखें; उसका साक्षी केवल भगवान् को बनाएँ।
मुख्य शब्द
- राजसिक तप
- सत्कार, मान, पूजा और दिखावे के लिए किया गया तप
- चल
- चंचल, अस्थिर
- अध्रुव
- अनिश्चित, क्षणिक फल वाला
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 17.13 – विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्
- गीता 17.14 – देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्
- गीता 17.15 – अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं
- गीता 17.16 – मनः प्रसादः सौम्यत्वं
- गीता 17.17 – श्रद्धया परया तप्तं
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- गीता 17.20 – दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे
- गीता 17.21 – यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य
- गीता 17.22 – अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते
- गीता 17.23 – ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः