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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 13

अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

vidhihīnamasṛṣṭānnaṃ mantrahīnamadakṣiṇam .
śraddhāvirahitaṃ yajñaṃ tāmasaṃ paricakṣate ॥

अर्थ

शास्त्र-विधि से रहित, अन्न-दान से रहित, मन्त्रों से रहित, दक्षिणा से रहित और श्रद्धा से रहित यज्ञ को (ज्ञानीजन) तामसिक कहते हैं

शब्दार्थ

  • विधिहीनम् – शास्त्र-विधि से रहित
  • असृष्टान्नम् – जिसमें अन्न का दान (वितरण) न हो
  • मन्त्रहीनम् – मन्त्रों से रहित
  • अदक्षिणम् – दक्षिणा से रहित
  • श्रद्धाविरहितम् – श्रद्धा से रहित
  • यज्ञम् – यज्ञ को
  • तामसम् – तामसिक
  • परिचक्षते – कहते हैं

अन्वय

विधिहीनम् असृष्टान्नं मन्त्रहीनम् अदक्षिणं श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।

व्याख्या

तीन प्रकार के यज्ञों में अन्तिम है तामसिक यज्ञ। इसके पाँच लक्षण बताए गए हैं, और सबमें एक बात समान है — अभाव। जहाँ सात्त्विक यज्ञ में सब कुछ पूर्ण है, वहाँ तामसिक यज्ञ में सब कुछ अधूरा या अनुपस्थित है।

‘विधिहीनम्’ — यह शास्त्र-विधि की उपेक्षा करके, मनमाने और अव्यवस्थित ढंग से किया जाता है। ‘असृष्टान्नम्’ — इसमें अन्न का दान नहीं होता। भारतीय परम्परा में यज्ञ के साथ भूखों और ब्राह्मणों को भोजन कराना उसका अनिवार्य अंग माना गया है; यज्ञ का अर्थ ही है बाँटना। तामसिक यज्ञ में यह उदारता अनुपस्थित है।

‘मन्त्रहीनम्’ — इसमें मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण नहीं होता, या मन्त्र ही नहीं होते। मन्त्र यज्ञ के प्राण हैं; वे कर्म को आध्यात्मिक दिशा देते हैं। ‘अदक्षिणम्’ — इसमें यज्ञ कराने वाले आचार्य या पुरोहित को उचित दक्षिणा नहीं दी जाती। दक्षिणा कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक है; उसका अभाव कृतघ्नता है।

सबसे मुख्य — ‘श्रद्धाविरहितम्’ — इसमें श्रद्धा ही नहीं होती। यह यज्ञ केवल परम्परा या सामाजिक दबाव में, बिना किसी भाव के, यन्त्रवत् किया जाता है। श्रद्धा के बिना बाकी सब भी व्यर्थ हो जाता है, जैसा इस अध्याय के अन्तिम श्लोक में स्पष्ट कहा गया है (17.28)।

ये पाँचों लक्षण आज के सन्दर्भ में भी समझे जा सकते हैं — कोई भी कार्य जो बिना अनुशासन, बिना उदारता, बिना उचित विचार, बिना कृतज्ञता और बिना हृदय के किया जाए, वह तामसिक है।

प्रसंग

श्लोक 11 और 12 में सात्त्विक और राजसिक यज्ञ बताए गए; यहाँ तामसिक यज्ञ बताकर यज्ञ का वर्णन पूरा होता है। अगले तीन श्लोकों में शरीर, वाणी और मन के तप का वर्णन है।

जीवन-शिक्षा

जो कर्म बिना अनुशासन, बिना बाँटे, बिना कृतज्ञता और बिना श्रद्धा के किया जाता है, वह खोखला रह जाता है। अपने हर शुभ कर्म में हृदय और उदारता अवश्य जोड़ें।

मुख्य शब्द

तामसिक यज्ञ
विधि, अन्नदान, मन्त्र, दक्षिणा और श्रद्धा से रहित यज्ञ
असृष्टान्न
जिसमें अन्न का वितरण न हो
दक्षिणा
यज्ञ कराने वाले को दिया जाने वाला सम्मानपूर्ण दान

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