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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 10

अध्याय 15 – पुरुषोत्तमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam .
vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ ॥

अर्थ

शरीर छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए, या गुणों से युक्त होकर विषयों को भोगते हुए भी इस जीवात्मा को मूढ़ लोग नहीं देख पाते; ज्ञान-रूपी नेत्रों वाले ही इसे देखते हैं

शब्दार्थ

  • उत्क्रामन्तम् – शरीर छोड़कर जाते हुए को
  • स्थितम् – शरीर में स्थित को
  • वा – या
  • अपि – भी
  • भुञ्जानम् – भोगते हुए को
  • गुणान्वितम् – गुणों से युक्त को
  • विमूढाः – मोहग्रस्त, अज्ञानी लोग
  • न – नहीं
  • अनुपश्यन्ति – देखते हैं, पहचानते हैं
  • पश्यन्ति – देखते हैं
  • ज्ञानचक्षुषः – ज्ञान रूपी नेत्रों वाले

अन्वय

उत्क्रामन्तम् स्थितम् वा अपि भुञ्जानम् वा गुणान्वितम् (एनम्) विमूढाः न अनुपश्यन्ति, ज्ञानचक्षुषः पश्यन्ति ।

व्याख्या

पिछले तीन श्लोकों में जीव की तीन अवस्थाएँ बताई गईं — शरीर ग्रहण करना और छोड़ना (उत्क्रमण), शरीर में रहना (स्थिति), और इन्द्रियों द्वारा विषयों का भोग। यह सब निरन्तर हमारे भीतर ही घट रहा है, फिर भी भगवान कहते हैं कि ‘विमूढ’ लोग इसे नहीं देखते। कितना आश्चर्य है — जो सबसे निकट है, वही सबसे अनदेखा रह जाता है।

कारण है ‘गुणान्वितम्’ — जीव गुणों से, अर्थात सुख, दुःख और मोह के अनुभवों से ढका हुआ है। मनुष्य का ध्यान इतना विषयों में उलझा रहता है कि वह यह नहीं सोचता कि इन सबका अनुभव करने वाला कौन है। जैसे सिनेमा देखने वाला परदे की कहानी में इतना खो जाता है कि उसे प्रोजेक्टर का प्रकाश याद नहीं रहता, जिसके बिना कोई दृश्य सम्भव नहीं।

परन्तु ‘ज्ञानचक्षुषः’, ज्ञान-नेत्र वाले, इसे देखते हैं। यह आँख शास्त्र, गुरु और विवेक से खुलती है। तेरहवें अध्याय (13.34) में भी भगवान ने कहा था कि जो ज्ञान-चक्षु से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद जानते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को दिव्य चक्षु दिए गए थे; यहाँ वह दिव्य दृष्टि ज्ञान के रूप में हर साधक के लिए सुलभ बताई गई है।

शंकराचार्य कहते हैं कि शास्त्र-प्रमाण से उत्पन्न विवेक-ज्ञान ही वह नेत्र है जो आत्मा को देह-इन्द्रियों से अलग पहचानता है। रामानुजाचार्य के अनुसार यह आत्मा के प्रकृति से भिन्न, ज्ञानानन्द-स्वरूप होने का विवेक है। मध्वाचार्य इसे भगवान की कृपा से मिलने वाला वह ज्ञान मानते हैं जो जीव को भगवान के अधीन, देह से भिन्न सत्ता के रूप में दिखाता है। अगले श्लोक में भगवान बताएँगे कि यत्न करने वाले योगी इसे देखते हैं, पर अशुद्ध-चित्त वाले प्रयत्न करके भी नहीं।

प्रसंग

सातवें से नौवें श्लोक तक जीव का शरीर में आना-जाना और विषयों का भोग बताया गया। यह श्लोक उस विवरण को समाप्त करते हुए बताता है कि अज्ञानी इस जीव को नहीं देखते, ज्ञानी देखते हैं। अगले श्लोक में योगियों के प्रयत्न और चित्त-शुद्धि की आवश्यकता बताई गई है।

जीवन-शिक्षा

हम पूरी दुनिया देख लेते हैं, पर देखने वाले को नहीं देखते। रोज़ कुछ क्षण रुककर यह पूछना कि ‘यह सब कौन अनुभव कर रहा है?’ ज्ञान की आँख खोलने का आरम्भ है। जो भीतर देखना सीख लेता है, उसके लिए बाहर की दुनिया भी बदल जाती है।

मुख्य शब्द

ज्ञानचक्षु
ज्ञान रूपी नेत्र, विवेक-दृष्टि
विमूढ
मोह से ढका हुआ, विवेकहीन
गुणान्वित
गुणों से युक्त, सुख-दुःख के अनुभवों से घिरा

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