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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 9

अध्याय 15 – पुरुषोत्तमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca .
adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate ॥

अर्थ

यह जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक — इन इन्द्रियों तथा मन का आश्रय लेकर विषयों का सेवन (भोग) करता है

शब्दार्थ

  • श्रोत्रम् – कान
  • चक्षुः – आँख
  • स्पर्शनम् – त्वचा, स्पर्श-इन्द्रिय
  • च – और
  • रसनम् – जीभ, रस-इन्द्रिय
  • घ्राणम् – नाक, गन्ध-इन्द्रिय
  • एव – ही
  • अधिष्ठाय – आश्रय लेकर, अधिष्ठित होकर
  • मनः – मन
  • अयम् – यह (जीवात्मा)
  • विषयान् – विषयों का
  • उपसेवते – सेवन करता है, अनुभव करता है

अन्वय

अयम् श्रोत्रम् चक्षुः स्पर्शनम् च रसनम् घ्राणम् एव च मनः च अधिष्ठाय विषयान् उपसेवते ।

व्याख्या

आठवें श्लोक में जीव के देह छोड़ने और नई देह पाने का वर्णन था; अब बताया जाता है कि देह में रहते हुए वह क्या करता है। वह कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक — इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों पर और छठे मन पर ‘अधिष्ठित’ होकर, मानो उनके सिंहासन पर बैठकर, शब्द, रूप, स्पर्श, रस और गन्ध का अनुभव करता है।

‘अधिष्ठाय’ शब्द महत्त्वपूर्ण है। इन्द्रियाँ स्वयं जड़ हैं; आँख अपने आप नहीं देखती, कान अपने आप नहीं सुनता। जब चेतन आत्मा उनमें अधिष्ठित होता है, तभी वे काम करती हैं। केनोपनिषद् इसी ओर संकेत करता है कि वह ‘कान का कान, मन का मन, आँख की आँख’ है। मन को साथ गिनना भी सार्थक है — मन के जुड़े बिना इन्द्रियाँ खुली रहने पर भी अनुभव नहीं होता; ध्यान कहीं और हो तो सामने की बात भी सुनाई नहीं देती।

‘उपसेवते’ — विषयों का सेवन करता है। यह भोग स्वयं में दोष नहीं; दोष तब होता है जब जीव स्वयं को भोक्ता और इन्द्रियों को ही अपना स्वरूप मान लेता है। तेरहवें अध्याय (13.21) में कहा गया था कि प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति-जन्य गुणों को भोगता है, और गुणों का यही संग उसके अच्छे-बुरे जन्मों का कारण है।

शंकराचार्य के अनुसार भोक्तृत्व आत्मा का वास्तविक धर्म नहीं, उपाधि के कारण आरोपित है। रामानुजाचार्य जीव को वास्तविक ज्ञाता और भोक्ता मानते हैं, जो कर्म के अनुसार प्रकृति के संग में यह अनुभव करता है। मध्वाचार्य भी जीव को भगवान के अधीन वास्तविक भोक्ता कहते हैं। अगला श्लोक बताएगा कि इतना सब करते हुए भी मूढ़ लोग इस भीतर बैठे जीव को देख नहीं पाते।

प्रसंग

पिछले श्लोक में देह-परिवर्तन के समय जीव द्वारा इन्द्रियों को साथ ले जाने की बात थी। यहाँ बताया गया है कि देह में रहते हुए वह इन्हीं इन्द्रियों और मन के माध्यम से विषयों का अनुभव करता है। अगले श्लोक में बताया जाएगा कि ज्ञानी ही इस जीव को देख पाते हैं।

जीवन-शिक्षा

इन्द्रियाँ खिड़कियाँ हैं और हम उनके पीछे खड़े देखने वाले हैं। जब यह याद रहता है, तो अनुभव हमें बहा नहीं ले जाते। हर भोग के बीच यह सजगता कि ‘अनुभव करने वाला मैं हूँ, अनुभव मैं नहीं’, आत्म-ज्ञान का द्वार खोलती है।

मुख्य शब्द

अधिष्ठान
आश्रय लेकर संचालन करना
ज्ञानेन्द्रिय
कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक
उपसेवन
विषयों का अनुभव या भोग

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