श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 5
अध्याय 15 – पुरुषोत्तमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्-
गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
nirmānamohā jitasaṅgadoṣā adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ .
dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñaira- gacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat ॥
अर्थ
जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो निरन्तर आत्म-तत्त्व में स्थित हैं, जिनकी कामनाएँ पूरी तरह निवृत्त हो गई हैं, और जो सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हैं — ऐसे मोहरहित ज्ञानीजन उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं
शब्दार्थ
- निर्मानमोहाः – अभिमान और मोह से रहित
- जितसङ्गदोषाः – जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है
- अध्यात्मनित्याः – निरन्तर आत्मज्ञान में स्थित
- विनिवृत्तकामाः – जिनकी कामनाएँ पूर्णतः शान्त हो गई हैं
- द्वन्द्वैः – द्वन्द्वों से
- विमुक्ताः – मुक्त
- सुखदुःखसंज्ञैः – सुख-दुःख नाम वाले
- गच्छन्ति – प्राप्त होते हैं
- अमूढाः – मोहरहित, ज्ञानी
- पदम् – पद को
- अव्ययम् – अविनाशी
- तत् – उस
अन्वय
निर्मानमोहाः जितसङ्गदोषाः अध्यात्मनित्याः विनिवृत्तकामाः सुखदुःखसंज्ञैः द्वन्द्वैः विमुक्ताः अमूढाः तत् अव्ययम् पदम् गच्छन्ति ।
व्याख्या
चौथे श्लोक में भगवान ने कहा था कि उस परम पद को खोजना चाहिए; अब वे बताते हैं कि वहाँ कौन पहुँचता है। यह मानो उस यात्री का चित्र है जिसने सचमुच असंग की कुल्हाड़ी चला दी है। पहला लक्षण है ‘निर्मान-मोह’ — न अभिमान, न मोह। अभिमान ‘मैं’ को फुलाता है और मोह ‘मेरा’ को; ये दोनों संसार-वृक्ष की सबसे मोटी जड़ें हैं।
दूसरा लक्षण है ‘जितसङ्गदोष’ — संग, अर्थात आसक्ति, स्वयं एक दोष है, और उन्होंने उसे जीत लिया है। तीसरा है ‘अध्यात्मनित्य’ — वे निरन्तर आत्म-चिन्तन में, परमात्मा के स्वरूप के विचार में स्थित रहते हैं। यह केवल नकारात्मक त्याग नहीं, सकारात्मक स्थिति है; मन को बाहर से हटाकर भीतर टिकाना। चौथा है ‘विनिवृत्तकाम’ — कामनाएँ दबाई नहीं गईं, बल्कि लौट गईं, शान्त हो गईं, जैसे दूसरे अध्याय (2.59) में कहा गया कि परम को देखकर रस भी निवृत्त हो जाता है।
पाँचवाँ लक्षण है सुख-दुःख कहलाने वाले द्वन्द्वों से मुक्ति। ‘संज्ञैः’ शब्द सूक्ष्म है — ये केवल नाम हैं, मन की व्याख्याएँ हैं; एक ही घटना किसी को सुख देती है, किसी को दुःख। जो इन लेबलों से ऊपर उठ जाता है, वही ‘अमूढ’ है, मोह से मुक्त। इन लक्षणों में बारहवें अध्याय के भक्त-लक्षणों और चौदहवें अध्याय के गुणातीत-लक्षणों की स्पष्ट गूँज है।
शंकराचार्य इन्हें ज्ञाननिष्ठ संन्यासी के लक्षण मानते हैं, जो आत्मज्ञान द्वारा अव्यय पद अर्थात ब्रह्म को प्राप्त करता है। रामानुजाचार्य ‘अध्यात्मनित्य’ को आत्म-स्वरूप के निरन्तर चिन्तन के रूप में देखते हैं, जो भगवान की शरण के साथ मिलकर जीव को उसके परम धाम तक ले जाता है। मध्वाचार्य के अनुसार ये गुण भगवान की कृपा से विकसित होते हैं और साधक को विष्णु-पद तक पहुँचाते हैं।
प्रसंग
चौथे श्लोक में परम पद की खोज और आदि पुरुष की शरण की बात हुई। यहाँ उस पद तक पहुँचने वालों के आन्तरिक गुण बताए गए हैं। अगले श्लोक में उस पद — भगवान के परम धाम — का स्वरूप बताया जाएगा।
जीवन-शिक्षा
मोक्ष किसी बाहरी स्थान की यात्रा से पहले भीतर के बदलाव की यात्रा है। अभिमान, मोह और कामना जितनी ढीली होती है, उतना ही हम उस शान्त पद के निकट होते हैं। सुख-दुःख को केवल नाम समझकर देखने का अभ्यास जीवन को बहुत हल्का कर देता है।
मुख्य शब्द
- निर्मानमोह
- अभिमान और मोह से रहित
- अध्यात्मनित्य
- सदा आत्म-तत्त्व में स्थित
- द्वन्द्व
- सुख-दुःख, मान-अपमान जैसे जोड़े
- अमूढ
- मोह से मुक्त, विवेकी
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 15.1 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 15.2 – अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
- गीता 15.3 – न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
- गीता 15.4 – ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
- गीता 15.6 – न तद्भासयते सूर्यो
- गीता 15.7 – ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः
- गीता 15.8 – शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः
- गीता 15.9 – श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं
- गीता 15.10 – उत्क्रामन्तं स्थितं वापि
- गीता 15.11 – यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्