श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 27
अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yāvatsañjāyate kiñcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam .
kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha ॥
अर्थ
हे भरतश्रेष्ठ, जो कुछ भी स्थावर या जंगम प्राणी उत्पन्न होता है, उसे तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुआ जानो
शब्दार्थ
- यावत् – जितना भी, जो भी
- सञ्जायते – उत्पन्न होता है
- किञ्चित् – कुछ भी
- सत्त्वम् – प्राणी, अस्तित्व वाली वस्तु
- स्थावर – अचल (वृक्ष, लता आदि)
- जङ्गमम् – चल (मनुष्य, पशु आदि)
- क्षेत्र – क्षेत्र, शरीर, प्रकृति
- क्षेत्रज्ञ – क्षेत्र को जानने वाला, आत्मा
- संयोगात् – संयोग से
- तत् – उसे
- विद्धि – जानो
- भरतर्षभ – हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन)
अन्वय
भरतर्षभ, यावत् किञ्चित् स्थावरजङ्गमम् सत्त्वम् सञ्जायते, तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् विद्धि ।
व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण सृष्टि का एक सार्वभौमिक नियम बताते हैं: जो कुछ भी जीवित है — चाहे वह अचल वृक्ष हो या चलने-फिरने वाला मनुष्य और पशु — उसका अस्तित्व क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, अर्थात् जड़ प्रकृति और चेतन आत्मा, के संयोग से है। केवल जड़ से जीवन नहीं बनता, और केवल चेतन देहधारी प्राणी के रूप में प्रकट नहीं होता। दोनों के मिलने पर ही ‘प्राणी’ बनता है।
पर यह संयोग कैसा है? आत्मा तो असङ्ग है; वह प्रकृति से वस्तुतः चिपक नहीं सकती। शंकराचार्य इसे स्पष्ट करते हैं कि यह संयोग वास्तविक जुड़ाव नहीं, बल्कि अध्यास है — एक का दूसरे पर आरोपण, जैसे रस्सी में साँप का भ्रम या सीप में चाँदी का। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के स्वरूप को न जानने से दोनों एक-दूसरे पर आरोपित हो जाते हैं, और यही आरोपण जन्म का कारण है। रामानुजाचार्य इस संयोग को वास्तविक मानते हैं — अनादि कर्म के कारण जीव का प्रकृति से संबंध, जिसे भगवान् अपनी इच्छा से नियमित करते हैं। मध्वाचार्य भी इसे भगवान् की इच्छा से होने वाला वास्तविक संयोग मानते हैं।
सातवें अध्याय (7.6) में भगवान् ने कहा था कि उनकी परा और अपरा प्रकृति ही सब भूतों की योनि है। चौदहवें अध्याय (14.3–4) में इसे और स्पष्ट किया गया है कि महद्ब्रह्म भगवान् की योनि है और उसमें वे बीज डालते हैं। इस प्रकार प्रत्येक जीव में भगवान् की दोनों शक्तियाँ मिली हुई हैं।
इस श्लोक का सन्देश यह भी है कि हर प्राणी में, चाहे वह कितना ही छोटा या साधारण दिखे, चेतना का अंश है। यह समझ अगले श्लोक (13.28) की भूमिका है, जहाँ सब प्राणियों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को देखने वाले को ही सच्चा द्रष्टा कहा गया है।
प्रसंग
श्रीकृष्ण अर्जुन को ‘भरतर्षभ’ कहकर सम्बोधित कर रहे हैं। पिछले श्लोक (13.26) में श्रद्धा से सुनकर उपासना करने वालों के उद्धार की बात थी। यह श्लोक बताता है कि सब प्राणी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न होते हैं, और अगले श्लोक (13.28) में सब भूतों में स्थित अविनाशी परमेश्वर को देखने की बात कही गई है।
जीवन-शिक्षा
हर जीव — वृक्ष, पशु या मनुष्य — में शरीर के साथ चेतना भी है। यह जानकर हम हर प्राणी के प्रति सम्मान और करुणा रख सकते हैं। अपने भीतर भी यह याद रखें कि शरीर के साथ जुड़ी चेतना ही हमारा वास्तविक स्वरूप है।
मुख्य शब्द
- क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-संयोग
- जड़ प्रकृति और चेतन आत्मा का मेल
- स्थावर-जङ्गम
- अचल और चल — सम्पूर्ण जीव-जगत्
- अध्यास
- एक वस्तु पर दूसरी का भ्रमपूर्ण आरोपण
- भरतर्षभ
- भरतवंशियों में श्रेष्ठ — अर्जुन का सम्बोधन
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 13.22 – पुरुषः प्रकृतिस्थो हि
- गीता 13.23 – उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता
- गीता 13.24 – य एवं वेत्ति
- गीता 13.25 – ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना
- गीता 13.26 – अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य
- गीता 13.28 – समं सर्वेषु भूतेषु
- गीता 13.29 – समं पश्यन्हि सर्वत्र
- गीता 13.30 – प्रकृत्यैव च कर्माणि
- गीता 13.31 – यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति
- गीता 13.32 – अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः